प्रश्नोत्तर P6-0027 · भाग 6
दांत चबाने के लिए हैं — दांत तोड़ने/दर्द पर मरने की बात कैसे?
इतना दर्द है। दर्द की बात है कि मौत उससे ज्यादा ठीक है। प्रत्यक्ष एक दांत तोड़, तू कहेगा मौत आ जाए वो ठीक है। ये दांत मत तोड़ भाई। सही बात ये मैं कह रहा हूँ। थोड़ा में ही गड़बड़ है। जरा पूरी तरह बात को सुन। पूरे पहले सुनो। समझो क्या बोला जा रहा है। नहीं है तो पूछ लो।
तो आप इस डर से निकलिए। क्योंकि यह डर आपको गुलाम बना के रखा है। कहीं सूर्य के गुलाम हो, कहीं चाँद के गुलाम हो, कहीं पेड़ के गुलाम हो। गुलामी है ना? अगर हम डर में किसी के सामने प्रणाम कर रहे हैं तो ये गुलामी है। कहीं जानवर के सामने हम प्रणाम कर रहे हैं। आप सोचिए, वो आपसे कोई प्रार्थना नहीं कर रहा है। वो अपना जी रहा है, मस्त। मतलब आपमें पैदा करने की क्षमता है, आप गुलाम बन गए। और वो प्रकृति के हिसाब से जीता है। वो स्वतंत्र है। आप एक पक्षी को पकड़ के पिंजरा मत लगाओ। कितना भी चारा दो, वो चारा पेट भरेगा और उड़ जाएगा। वो आपके साथ नहीं रहेगा। वो आपके भोजन के लालच में आपके साथ नहीं रहने वाला है। पक्षी उड़ जाएगा। स्वतंत्रता सबको चाहिए। तो मेरे से अच्छा देखा जाए तो वो है। मतलब हम सब कुछ होते हुए भी, हमारे हाथ-पैर हैं, सब कर सकते हैं। लेकिन आप देखोगे, बस ये पेट के लिए, एक कपड़े के लिए, और एक घर के लिए हम भीख माँगते रहते हैं। पूरी जिंदगी भीख माँगने में गुजर जाती है। कभी प्रतिमा के सामने, कभी जानवर के सामने। कभी पानी के सामने, नदियों के सामने, कभी तालाब के सामने। और यहाँ तक कि अभी तो कुत्तों की भी समाधि बहुत है देश में। बहुत जगह है। वहाँ भी माँगने लगते हैं।
मेरा कहना है इससे निकालो। अगर आध्यात्मिक यात्रा करना है तो इससे निकालो। अगर प्रणाम करना है तो आप उसका कर्म देखिए। कर्म को प्रणाम करिए। लालच में प्रणाम किसी को मत करिए। उसके द्वारा अगर कर्म कुछ समाज हित के लिए हुआ है तो वो पूजनीय है। वो प्रणाम के योग्य है। तो अपने आप को डर से निकालिए। हम बहुत डरे हुए हैं। और हमारे डर का लोग फायदा उठा लेते हैं। इससे अपने आप को निकालिए।
मंदिर में पुजारी बैठा है। कह रहा है, तुम इतना ही नहीं, इतना दो। जाओ, तुम्हारा काम हो जाएगा। अगर ऐसा कुछ होता तो वो सुबह आता और बोल देता, शाम तक मुझे इतनी चाहिए। उस मूर्ति से उसे पता है, ये मूर्ति कुछ नहीं देने वाली है। लेकिन तुम देने वाले हो। अगर उस प्रतिमा से कुछ मिलता तो वो सुबह आता और बोल देता, शाम तक मुझे भैया एक हजार, दो हजार, इतना हमें दे देना। वो आपसे क्यों गिड़गिड़ाता? चल, एक सौ रुपये से शुरुआत करता है, कपड़े देख के। चल अच्छा, ग्यारह सौ दे दे। मतलब वो आपसे क्यों गिड़गिड़ा रहा है? उसे पता है ये कुछ नहीं देगा। लेकिन आप दोगे, उसे यह पता है, क्योंकि आप डरे हुए हो। आप डरे हो इसलिए उसे दे रहे हो, कि अगर ये रूठ गया तो वो भी रूठ जाएगा और मेरी हानि हो जाएगी। ऐसा कुछ भी नहीं है। ये भी रूठ के कुछ नहीं उखाड़ सकता, वो भी रूठ के कुछ नहीं उखाड़ सकता। जैसा आपने कर्म किया है, वैसा ही आपको परिणाम मिलेगा। आपके कर्म का परिणाम मिलेगा। किसी के रूठने, किसी के खुश होने से कुछ नहीं होता। आपने जैसा किया है, वैसा ही आपको मिलने वाला है। ये पक्का है।
तो इन सब बातों को समझते हुए ईमानदारी, सत्कर्म, जरूरत में जीना चालू करो। और इतना आप समझ लो कि मुझे किसी से माँगना नहीं है, और मेरे हक का छोड़ना नहीं है। बात खत्म। मैंने अगर कुछ काम किया है, तो मेरे काम का परिणाम अगर कुछ है, मुझे पता है, तो मुझे परिणाम लेना है। बात खत्म। उसके लिए चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े। भाई, कभी-कभी ऐसा होता है ना, जहाँ हमने काम किया। अब मैं काम तो नहीं करना चाहता, लेकिन मेरा पेमेंट रुक गया है और वो नहीं दे रहा है, तो लेके ही हटो।
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