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प्रश्नोत्तर P6-0029 · भाग 6

आप आए किस लिए हो? (शोध छात्र — इंडियन साइकोलॉजी/साधु)

पहले ये तो ईमानदारी से बताना कि आप आए किस लिए हो। मैंने आज तक कोई शिष्य नहीं बनाया। वो मुझे गुरु मानते हैं, और मैं शिष्य उसे समझता हूँ जिसकी जिज्ञासा आत्मिक कल्याण के लिए है। वो शिष्य है। बात ऑन कैमरा होगी, सबके सामने। गुरु से अकेले में बतियाना है, तो वो कहीं न कहीं लालच होगा। सत्संग के बाद अगर कुछ होगा, देख लेंगे। असंभव नहीं है। आप कुछ समझना चाहते हो, समझ के कुछ करना चाहते हो, अपने लिए या समाज के लिए, तो वो देखा जाएगा। और अगर ऐसे कोई प्रश्न है तो आप कर सकते हो। पहले ये देख लो कि मैं प्रश्न के लायक हूँ कि नहीं। मैं प्रश्न तो पूछूँ, लेकिन मैं उस उत्तर के लायक हूँ कि नहीं। तभी उत्तर का मतलब होगा, नहीं तो उत्तर भी ऐसे ही चला जाएगा। जैसे एक छह-सात साल के बच्चे की शादी करा दी जाए, तो उस शादी का उसके जीवन में कोई मतलब नहीं है, बुड्ढे का खेल है। लेकिन वही जब बीस साल का हो जाता है और उसकी शादी कराई जाए, तो उस शादी का मतलब है। अगर आप प्रश्न के लायक हो कि नहीं, पहले वो आप देख लो। शोरूम में चले जाओगे, कहोगे गाड़ी दिखाओ। उसका तो बेचारे का काम है, सर लीजिए। तुम कहोगे, नहीं यार, बस देखने आया था, लेने नहीं। तब तो वो तुम्हारा दोबारा कभी हिलने नहीं देगा। तो आप गए हो तो देखो, मैं उस लायक हूँ कि नहीं। आप पूछने लायक बनो, तभी उत्तर का मतलब समझ में आएगा। अगर आप पूछने लायक नहीं हो, तो उत्तर का भी मतलब नहीं है। आज के युवा ठीक हैं। और आज के युवा धर्म को मानते हैं। जब किसी ने कहा कि तुम आरती करो, तो उन्होंने कहा कि इस आरती से मिलेगा क्या? इसका जवाब हमारी पीढ़ियों को नहीं था, इसलिए वो नहीं मान रहे। आज के युवा कुछ करना चाहते हैं समाज के लिए, लेकिन उनके पास जवाब नहीं है। तीस साल पहले के लोग क्या थे? अगर उनको उनके बाप ने ये कह दिया, तो वो कर रहे हैं। उसका परिणाम वो नहीं पूछते थे, आए और चाहे ना आए। लेकिन करने के पहले ही युवा पूछ रहा है कि मैं ये करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन इससे होगा क्या? ये जवाब नहीं है, इसलिए वो कर नहीं रहा। क्यों अपना समय बर्बाद करें? तो मेरे समझ से आज के युवा ठीक हैं। धर्म क्या है? आप इतना घूमे। धर्म की परिभाषा क्या है? आप कैसे कह सकते हो कि यह व्यक्ति धार्मिक है कि नहीं? किस आधार पे? क्या भगवान को मान ले तो धार्मिक हो गया? नहीं माने तो अधार्मिक हो गया? क्या यह आधार है? यह परिभाषा नहीं है। पहले तो धर्म की परिभाषा समझना पड़ेगा कि धर्म क्या है। धर्म और अधर्म, दो हैं। जब हमारे द्वारा किसी जरूरतमंद की सेवा होती है, तो वहाँ परोपकार होता है, और जहाँ परोपकार होता है वहाँ धर्म घटित होता है। और वह जरूरतमंद की सेवा जब होती है, तो करने वाला धार्मिक बनता है। ये धर्म की परिभाषा है। अधर्म की परिभाषा क्या है? जब आप किसी को सताते हो, बिना मतलब का, ऐसा उसने कोई काम नहीं किया है, तो वहाँ अधर्म घटित होता है, और सताने वाला व्यक्ति अधार्मिक हो जाता है। धर्म करने में, मानने में नहीं। अधर्म करने में, मानने में नहीं। ये धर्म की परिभाषा है। आप एक महीना घूमे। जिसकी खोज में निकले थे, पहली सीढ़ी का ही पता आपको नहीं है। मैं जो टॉपिक लेके चला हूँ, उस टॉपिक का ही क्या है, वो पता नहीं है, तो आप आगे जितना भी समझोगे, कोई मतलब नहीं है। गणित में जब पहला ही अंक आपने एक की जगह दो मार दिया, तो आपको लग रहा है सवाल कभी सही हो सकता है? मतलब आप जिसको लेके चले थे, पता ही नहीं लेके क्या चला हूँ। तो आपकी जिंदगी बीत जाती है और आपको कुछ समझ में नहीं आता। आपके जीवन में सिर्फ बातें रहती हैं। मेरा कहना यही है कि अगर आप कुछ खोजने चल रहे हो, तो उसके बारे में ज्ञान आपको होना चाहिए। धर्म की परिभाषा क्या है, यह आपको पता होना चाहिए। ये आपको पता नहीं था, और एक महीना बीत गया। तो किसी से बात करने के पहले, अगर आपको धर्म की परिभाषा नहीं मालूम थी, तो धर्म की परिभाषा ही पूछना चाहिए था। फिर आपको आगे बढ़ना चाहिए था। धर्म की परिभाषा तो एक ही होगी। देखने का नजरिया अलग होगा, मूल तो एक ही होगा। अगर आपको कुछ पता है तो बोलना चाहिए, तो मैं उसके बारे में फिर बताऊँगा। जहाँ परोपकार घटित होता है, वहाँ धर्म घटित होता है, और वो आपको धार्मिक बनाता है। जिसके द्वारा परोपकार हुआ है, वो व्यक्ति धार्मिक बनता है। और परोपकार मतलब क्या? परोपकार मतलब जरूरतमंद की सेवा। जहाँ इच्छा और उपेक्षा ना हो। निष्काम से, ये परोपकार है। कोशिश से नहीं होगा। जैसे कोई गिर जाता है, आप उठाने जाते हो, वहाँ इच्छा-अपेक्षा काम करती है क्या? नहीं करती। तो ये मौका प्रकृति देती है। ये आप प्लानिंग से नहीं कर सकते। ये मौका आपको प्रकृति देती है। अपने आप को, अपनी चेतना को इतना विकसित तो कर सकते हो कि हमारे अंदर वो भाव ही ना रहे कि हम किसी लालच के लिए किसी का कुछ लें। ये आत्मज्ञान के बाद होगा, या गुरु के सानिध्य में होगा। या तो आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाओ, तब आप उस स्थिति में हर समय, हर पल रहोगे। या गुरु के सानिध्य में रहो, तो इच्छा-अपेक्षा काम ही नहीं करने देगा, वो उसकी ऊर्जा से, उसकी समझ से। बाकी अगर आप अकेले हो, तो आपको प्रकृति मौका देगी। आप प्लानिंग करके ये नहीं कर सकते। गुरु के सानिध्य में रहने वाले को चौबीस घंटे मिलेगा, हर क्षण मिलेगा। उसके द्वारा कुछ भी होगा तो परोपकार होगा, सत्कर्म होगा। और अगर वो गुरु के सानिध्य में नहीं, अकेले है, तो पापी से भी परोपकार हो जाता है। आप ये ना समझना। प्रकृति आपको मौका देगी ही। चाहे वो पापी के द्वारा भी परोपकार हो जाता है। दुष्ट आदमी भी, कोई गिर गया, तो उठा ही लेता है। उठाने का तरीका भले ही अलग हो। परोपकार दुष्ट के द्वारा भी हो जाता है। जो गृहस्थ है, वो ईमानदारी और सत्कर्म अपना ले। जब भी मौका मिले, सत्कर्म करे, और ईमानदारी से उसका इनकम हो, तो उसका विकास होता जाएगा। लेकिन गुरु के सानिध्य में रहने वाले की तरह विकास नहीं होगा। जैसे दो पौधे लगाइए। एक को खूब खाद-पानी दीजिए, और एक को बस उसके हाल पे ही छोड़ दीजिए। कौन से पौधे की उन्नति जल्दी होगी? जिसकी देखभाल की जाएगी, जिसकी निराई-गुड़ाई होगी, जिसको खाद दिया जाएगा। और अगर वो अपने हाल पे ही पड़ा रहा, तो वो भी होगा, लेकिन इसके जैसा वो तैयार नहीं होगा। उसकी संभावना थोड़ी कम है। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु क्या है? ज्ञान का प्रतीक है। इसलिए मैं गृहस्थियों से कहता हूँ कि भाई, बारह महीने होते हैं, तो एक महीना अपने आप को दो। एक महीना जाके एकांत में रहो, या गुरु की खोज में रहो, या गुरु के सानिध्य में रहो। लेकिन एक महीना अपने आप को दो। अगर गुरु मिल गया हो, जीवंत गुरु, आत्मिक कल्याण वाला गुरु, तो गुरु के सानिध्य में एक महीना लगातार रहो। सब कुछ छोड़कर, ग्यारह महीने अपने घर वालों को दो। एक महीना अपने आप को दो। और अगर आपको गुरु नहीं मिला है, तो एक महीना भ्रमण करो, गुरु की खोज में। भ्रमण कहाँ करना है? तीर्थस्थान, क्योंकि ज्यादा वही मिलेंगे। जहाँ फैक्ट्री है, वहाँ थोड़ी न गुरु मिलेंगे। जंगलों में जाओ, तीर्थस्थानों पे जाओ, गुरु की खोज में। कोई माँग के चक्कर में नहीं, गुरु की खोज में। और अगर गुरु मिल जाए, तो उसके सानिध्य में, ग्यारह महीना घर, एक महीना गुरु, ये देना पड़ेगा, अगर निकलना है तो। और ऐसे ही रहना है, तो फिर पड़े, किसी का क्या जाता है। सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है। जब आप परोपकार का समय आएगा, जरूरतमंद की सेवा का समय आएगा, उस समय इच्छा-अपेक्षा काम ही नहीं करती। अब करना ना करना आपके ऊपर है। आप अवॉइड करके जाते हो, या आप प्लानिंग से करते हो, तो उसमें इच्छा-अपेक्षा काम ही करती है। लेकिन अगर मैं इच्छा और अपेक्षा में भी सही काम तो कर रहा हूँ, तो कहीं न कहीं आपको प्रकृति और भी परोपकार का मौका देगी। जैसे-जैसे आपका सेवा का भाव बढ़ेगा, कि मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ, अगर प्लानिंग से भी तुम कर रहे हो, अब उसमें इच्छा-अपेक्षा तो काम करेगी क्योंकि प्लानिंग है, तो प्रकृति जब आपके भाव को देखेगी कि नहीं, ये व्यक्ति सत्कर्म करना चाहता है, तो आपके जीवन में ऐसे ज्यादा लोग मिलने लगेंगे। जहाँ प्लानिंग, वहाँ इच्छा-अपेक्षा। और जहाँ प्लानिंग नहीं, वहाँ इच्छा-अपेक्षा नहीं। प्लानिंग कहाँ नहीं? जब अचानक घटना घटती है। जब अचानक घटना घटती है, तो वहाँ प्लानिंग नहीं होती। तो जब आप शुद्ध भाव से सेवा करोगे, तो प्रकृति आपको मौका देगी। और हो सकता है कि आप पूरी तरह करना चाहो, तो कोई गुरु मिल जाएगा। तब आपके द्वारा पूरी तरह सत्कर्म ही होगा, और आप जल्दी से जल्दी आत्मज्ञान तक पहुँच जाओगे। आत्मज्ञान मतलब अपने आप में हो जाना, पूरी तरह। मैं मेरा में फँसा हूँ। अनेक पिंड में फँसा हूँ, और मेरा मेरे सामने है। इसलिए मुझे कहना पड़ रहा है कि मुझे अपने आप में होना है, क्योंकि मैं और कहीं हूँ। और जब मैं अपने आप में हो जाऊँगा, तो मुझे अपने आप में होने के लिए कुछ कहना ही नहीं पड़ेगा। क्योंकि मैं और कहीं हूँ, तो मुझे, मैं जहाँ हूँ, वहाँ से हटने के लिए एक जगह का चुनाव करना पड़ेगा। जैसे एक वस्तु आप उठाते हो, तो ये उठाने के पहले आपको सोचना पड़ेगा, मैं रखूँगा कहाँ? नहीं तो लेके घूमते रह जाओगे। तो मैं कहीं और हूँ। अब मुझे वहाँ से हटना है, तो मुझे पहले ही बताना पड़ेगा कि यहाँ से हट के जाओगे कहाँ। तभी वो वहाँ से हट पाएगा। क्योंकि एक वस्तु उठाओगे, तो कोई तो रखने का आधार चाहिए। अगर आधार नहीं है, तो आप उठा ही नहीं सकते। एक जगह से उठाने के लिए, उठाने के पहले दूसरी जगह तैयार करना है, नहीं तो उठ ही नहीं सकता। वही पड़ा का पड़ा रह जाएगा। जैसे मैं घर से निकलने से पहले सोचूँ कि अगर मैं निकल रहा हूँ तो जाऊँगा कहाँ। एक वस्तु को उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखने के लिए आपको एक जगह पहले चाहिए। जब रखने वाली जगह पूरा पक्का हो जाएगा, कि यहाँ से मैं उठा के यहाँ रख दूँगा, ये जगह पक्की मेरी है, तब वहाँ से अपने आप को उठा के आप यहाँ रख दोगे। और यह तभी हो पाएगा जब आप निर्भरता छोड़ो। क्योंकि आप कुछ लालच में ही तो उसके पिंड में हो। वो लालच का त्याग करोगे, तो वहाँ रहोगे ही नहीं। उस व्यक्ति से आपको तकलीफ नहीं है, उस लालच से तकलीफ है। और जैसे ही वो लालच हटी, आप वहाँ रह ही नहीं सकते। जब तक लालच है, आप कितना भी उसे हटाओ, वहाँ से वो हट ही नहीं सकता। मेरा लालच ही मुझे वहाँ अटकाए हुए है। मूल लालच का त्याग करना पड़ेगा। लेकिन ये स्वतः थोड़ी न होगा। जब तक मेरी वृत्ति उसमें फँसी है, वो लालच, वो लोभ, वो रस, जब तक कुछ चाहिए, तब तक लालच है। मैं अगर ये सिर्फ मंत्र लूँ, मुझे कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं होगा। ऐसे नहीं होगा। कुछ नहीं चाहिए, इस स्थिति में आने के लिए काम करना पड़ेगा। अब देखना यह है कि मैं उसमें फँसा क्यों हूँ। वो पूरी तरह देखना पड़ेगा। जब आप फँसेपन को देख पाओगे, तब आप अपने आप को निकाल पाओगे, कि ये मुझे नहीं चाहिए। जब इस स्थिति में पहुँच जाओगे, यह देख पाओगे कि क्या मुझे चाहिए, क्यों मैं फँसा हूँ। जब देख पाओगे कि यह मुझे नहीं चाहिए, ये चाहिए की वजह से मैं फँसा, अब मुझे नहीं चाहिए, तब अपने आप को निकाल लोगे। जैसे ही आंतरिक हुआ कि अब मुझे नहीं चाहिए, आप तुरंत निकल जाओगे। तब आप रह ही नहीं सकते। लेकिन जब ये देख पाओगे, और उसके बाद मुँह से बोल रहे हो कि नहीं चाहिए, और पता चला अंदर से चाहिए, तब आप नहीं निकल पाओगे। आंतरिक होना चाहिए, पक्का, मुझे नहीं चाहिए। तभी आप वहाँ रह ही नहीं सकते।

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