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प्रश्नोत्तर P6-0030 · भाग 6

सामर्थ्य अनुसार लो — गृहस्ती में साथी के साथ कैसे अपनाएं?

अगर आज मैं व्यवस्था नहीं दे रहा, तो जितना भी काम है मैं स्वयं ही करूँगा। मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि मुझे किसी पे निर्भर नहीं होना है। तभी उठ पाओगे, तभी आपका स्तर उठेगा। क्योंकि अगर आप निर्भर हो, तो उठना भी चाहोगे तो दबा देगा। क्योंकि मैं भी तो उससे कुछ ले रहा हूँ। वो सामने वाला दबा देगा। अगर वो स्वाभाविक कर रहा है, तो करने दो। अगर ईमानदारी से जितनी व्यवस्था आप जुटा पा रहे हो, उसमें वो खुश है, तो उसे भी आपके लिए कुछ करने दो। और अगर वो चाह रहा है कि नहीं, मुझे आपके लिए नहीं करना है, तो आप अपने शरीर के लिए खुद कार्य कर लीजिए। सीधी सी बात है। अब देखना है कि उसका भाव क्या है। हम एक-दूसरे के पूरक हैं। लेकिन सामर्थ्य होकर निर्भर रहो। दुकानदार तुम पे निर्भर है, और तुम दुकानदार पे। वो सामान दे रहा है, वो पैसा ले रहा है, वो कमा रहा है। लेकिन आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार जाइए। तो दुकानदार से राग-द्वेष नहीं होगा। और अगर आप उधार के चक्कर में गए हो, उधारी समय पर नहीं लौटा पाओगे, तब पहले राग होगा, क्योंकि उसने मुझे उधार दिया। अब हम समय पे उधारी नहीं लौटा पाएँगे, तो द्वेष हो जाएगा। और हमारे पास जितनी सामर्थ्य है, अगर मैंने उतना सामान लिया है, तो हम हमेशा दोनों मुस्कुरा कर मिलेंगे। ना राग होगा, ना द्वेष होगा। तो अगर आपको कुछ चाहिए, तो आप उससे योग्य रहो, मिलेगा। नहीं तो किसी और से ही। गृहस्ती में भी यही है। बस आपका ईमानदारी से इनकम हो, उसी में भरण-पोषण हो। यही करना पड़ेगा। देखना ये है कि क्या वो नहीं करना चाहता। कौन करना चाहेगा? अगर आप ये सोचते हो कि मैं किसी का भरण-पोषण नहीं कर रहा, या अपना बाँट दिया, तो कौन करना चाहेगा? तब आप खत्म करो, आप खुद करो। क्योंकि अगर आप उसके बाद करवाओगे, तो वो तकलीफ देगा, आपको मानसिक पीड़ा देगा। सामने वाला कुछ भी उल्टा-सीधा बोलेगा, उसका प्रभाव आप पे पड़ेगा। तो अपना काम खुद करो। स्वाभाविक करता है तो बात अलग है। प्रेम से करता है तो बात अलग है। दबाव और संकोच में हमें किसी से कुछ करवाना ही नहीं चाहिए, क्योंकि दबाव और संकोच में करवाओगे तो आप गिर जाओगे। अगर योग्यता है, और मैं इतना कमा सकता हूँ कि मैं उसको रख सकता हूँ, तो रख ही लेना चाहिए। किसी को नौकरी तो मिली। निर्भरता तब होता है जब हम उसे उसके बदले कुछ देते नहीं। तब मुझे उसके अधीन रहना पड़ता है। उसकी जरूरत मुझे है, और मेरी जरूरत उसे है। मेरे पास कुछ है, उसे चाहिए। और उसके पास कुछ है, वो दे रहा है। हम उसकी कीमत दे रहे हैं। तो व्यापार पूरा चल रहा है। देना तो पड़ेगा। अभी यहाँ पे हम लाइव वीडियो देख रहे हैं, तो इसमें पैसे लग रहे हैं। हम उसे दे रहे हैं, वो मुझे व्यवस्था दे रहा है। अगर वो मेरी व्यवस्था छीनेगा, तो हम उसे नहीं देंगे। और हम नहीं देंगे, तो वो नहीं देगा। हम रिचार्ज नहीं कराएँ, तो लाइव नहीं बैठ के देख सकते। तो लेन-देन तो करना पड़ेगा। अगर कुछ काम करना है, तो आपको लेन-देन करना पड़ेगा। बाहर कितने लोग देख रहे हैं, इसके लिए पैसा लग रहा है। हमने रिचार्ज कराया है, और उसको भी रिचार्ज की जरूरत है, क्योंकि उसका सिस्टम कैसे चलेगा। सब एक-दूसरे के पूरक हैं। बस मुझे ये देखना है कि मेरा उपयोग, और मैं जिसका उपयोग कर रहा हूँ, सात्विकता में हो, तामसी में ना हो। दुरुपयोग ना हो, सदुपयोग हो। हम उसकी मेहनत का ही उसे दें। मजबूरी का फायदा ना उठाएँ। क्या सच में मैं जो ले रहा हूँ, उसकी सही कीमत दे पा रहा हूँ? ऐसा तो नहीं, सामने वाला भोला है और मैं उसको ठग रहा हूँ। ये देखना है। ये सोच गलत नहीं है। एकदम सही है। मैं चाहता हूँ, कर ही लेना चाहिए। दिक्कत उसकी नहीं आती। दिक्कत ये आती है कि हमें अपने सर पे कोई नहीं चाहिए। अब तुम्हें सर पे नहीं चाहिए, तुम आराम करना चाहते हो, और मैं नौ बजे आके भी काम करूँ। वहाँ क्लैश होता है। आपकी गलत नहीं है। लेकिन सामने वाला भी कह रहा है कि नहीं, हम उसे अपने पास नहीं रख सकते, प्राइवेसी खराब होती है, सर पे कोई बैठा रहता है पूरे टाइम। वो भी अपनी जगह से ही है। अगर देखा जाए तो वो भी अपनी जगह सही है, कि वो जीना चाहता है। तो देख लो, कैसे क्या होगा।

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