प्रश्नोत्तर P6-0039 · भाग 6
शरीर की तीन अवस्थाएं बताई जाती हैं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। इस समय हम जागृत अवस्था में हैं, ऐसा कहा जाता है। जब स्वप्न में होते हैं तो उसे सच मान लेते हैं, पता ही नहीं रहता कि स्वप्न चल रहा है, जागृत की तरह लगता है। स्वप्न टूटते ही लगता है कि वह कुछ और था और अब कुछ और है। उसको अनुभव करने वाला कौन है? कई जगह जाकर सुना कि आत्मा है। अगर आत्मा का अनुभव एक बार हो गया, उस बिंदु को छू लिया, तो फिर दूसरों के दर जाने की क्या जरूरत? इससे तो लगता है कि आत्मा है ही नहीं। क्या हम रोबोट की तरह हैं, जिसमें मेमोरी फिट कर दी गई है, इनपुट डाल दिया गया है, और टेक्नोलॉजी से ऊपर का अनावश्यक ज्ञान दिया जा रहा है? इसे उदाहरण से स्पष्ट करें, ताकि सरलता से समझ आए और जीवन भर उस पर चला जा सके। स्वप्न तो ऐसे भी आते हैं जो इस जन्म की कामना नहीं लगते, ऐसे दृश्य, लोग और रूप जिनकी कल्पना भी नहीं हो सकती।
पहले तो आप जागृत स्थिति समझिए कि आप जाग रहे हो। तो ये भी जागृत स्थिति नहीं है। आप इसे जागृत स्थिति ना समझिए। आप तो कामनाओं में भाग रहे हो, मान के चक्कर में भाग रहे हो। ये मत समझो कि मैं जागृत हो गया हूं।
स्वप्न भी अगर देखने वाला है तो तुम ही हो, जीवात्मा। इच्छा और अपेक्षा में ही स्वप्न देखा जा रहा है। अगर आप स्वप्न देख रहे हो तो उसमें भी आप अपनी कामनाओं की ही पूर्ति करते हो। जब हम जागते हैं तो हम ये देख पाते हैं कि हंसी आती है अपने को, वो तो झूठा था। यह उदाहरण इसलिए दिया गया है कि अभी आप जिसमें लिप्त हो, कर्ता अपने आप को समझ रहे हो। जिस दिन आपको ज्ञान होगा, अपने आप का बोध होगा, आत्मज्ञान होगा, आप राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मेरा कर्ता से मुक्त हो जाएंगे। तो जैसे स्वप्न के बाद आप ये देख पाते हो कि मैंने स्वप्न देखा लेकिन मैंने उसमें कुछ नहीं किया, वैसे ही जैसे ही आप इससे मुक्त हो जाओगे, जाग जाओगे, आप राग और द्वेष से मुक्त हो जाओगे। तब आप ये देख पाओगे कि मैं तो इतना परेशान था, लेकिन मैं परेशान ही नहीं था। परेशान का कारण कुछ और था।
जैसे स्वप्न का कारण नींद है। अगर नींद ना लगे तो स्वप्न आएगा नहीं। नींद कारण बन गई स्वप्न की। राग और द्वेष, मेरे तरीके से मुझे चाहिए, यह भी एक नींद है। यह उदाहरण इसीलिए दिया गया कि आप जागो। स्वप्न कौन देख रहा है, आप उसमें मत जाओ, नहीं तो जिंदगी बीत जाएगी। हमें तो ये देखना है कि मैं जागते हुए दुखी क्यों। दुख मेरे पास आया कहां से। दुख का कारण क्या है, दुख की वजह क्या है, उस वजह को देखना है। क्या मैंने ऐसा किया कि मैं दुखी हुआ? जैसे स्वप्न का कारण नींद है, वैसे हमारे दुख का भी कोई कारण है। जब हम नींद से जागते हैं, नींद जैसे ही हट जाती है वैसे स्वप्न भी खत्म हो जाता है। वैसे ही जैसे ही आप इस उम्मीद से मुक्त हो जाएंगे कि मेरे तरीके से ही चाहिए, उम्मीद भी एक नींद की तरह है, उम्मीद से मुक्त होते ही आपको हंसी आ जाएगी।
स्वप्न में भी आप कामनाओं की पूर्ति करते हो, इसलिए जीव कहा गया। आत्मा ही जीवात्मा है। जैसे पानी ही बर्फ है, लेकिन वो कोई कारण से बनी है, सीधी बर्फ नहीं बनी। उसके पीछे कोई कारण है। और पानी ही भाप है। मूल पानी है, लेकिन भाप भी बनी तो कोई कारण, और बर्फ भी बनी तो कोई कारण। अगर वो कारण हट जाए तो फिर किसमें आ जाएगा? पानी में। तो बर्फ झूठी हो जाएगी जब वो पानी में आ जाएगी। आप जैसे ही राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मेरा कर्ता के भाव से छूटोगे तो आपको हंसी आ जाएगी, क्योंकि मैं कारण में घूम रहा था। कारण ही दुख था। वो कारण हटाना पड़ेगा।
स्वप्न देखने वाला जीवात्मा है। ये स्थूल शरीर से अपनी कामनाओं की जब पूर्ति नहीं करता, तो सूक्ष्म शरीर से जाकर कामनाओं की पूर्ति करता है। हमें ऐसे ऐसे दृश्य दिखते हैं कि हम सोच भी नहीं सकते। स्वप्न में हमारे साथ ऐसी ऐसी घटनाएं होती हैं, ऐसे ऐसे लोग मिलते हैं, ऐसे ऐसे रूप आते हैं जिनकी हम कल्पना भी समाज में नहीं कर सकते। लेकिन वो आते हैं। कहीं ना कहीं उसका आधार हमारा कर्म है। हमारे साथ जो भी कुछ हो रहा है, उसका आधार मेरा किया गया ही कर्म है।
जीवात्मा क्या करता है? स्थूल शरीर, कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर। कारण शरीर मतलब कारण में जीना। आप कारण से ही जी रहे हो, कारण से ही आ जा रहे हो, तो ये कारण शरीर है। जब ये स्थूल शरीर से अपनी कामना पूरी नहीं कर पाता, तो जीवात्मा स्वप्न में जाकर उसे पूरा करता है। उसे हमने स्वप्न का नाम दे दिया है, क्योंकि कुछ समझने के लिए कुछ नाम देना पड़ता है। वो जाकर अपनी इच्छा सूक्ष्म शरीर में पूरी करता है। अब देखो, कामना का ही तो पूरा कर रहा है। चाहे स्थूल शरीर से, जिसे तुम जागृत अवस्था समझ रहे हो, उसमें भाग रहे हो, चाहे स्वप्न में भाग रहे हो, लेकिन कामना ही तो पूरी कर रहे हो। आप कामनाओं से अपने आप को छुड़ाओ, अगर इस रहस्य को पूरी तरह खोलकर प्रत्यक्ष देखना है।
अभी आप किसी के द्वारा देख रहे हो। जैसे कोई कम देखने वाला है और कोई ज्यादा देखने वाला है, तो ज्यादा देखने वाला बता रहा है कि तू कहां तक देख रहा है, इसके आगे वो है। अब वो उसकी बात पर विश्वास करके धीरे-धीरे जाता है, तो उसको आगे भी दिखने लगता है। आप कामनाओं से मुक्त होने के लिए काम करो। अब इसको भी छोड़ो। स्वप्न जीवात्मा देख रहा था। जब आत्म तत्व में स्थिर हो जाओगे तो बात ही खत्म हो जाएगी।
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वीडियो: Sunday Q&A May 3, 2026 #Yogi · 2026-05-03