प्रश्नोत्तर P6-0045 · भाग 6
स्वप्न, जागृत और सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएं हैं। जो आत्मज्ञानी पुरुष हैं, क्या उन्हें भी वैसे ही स्वप्न आते हैं जैसे हमें दिन भर की क्रियाओं से, या पहले कभी हुई बातों से आते हैं? किसी और के सानिध्य में सुना है कि स्वप्न आते ही नहीं। यहां आने से पहले मैं किसी और से जुड़ा था, अभी भी जुड़ा हूं, और उनका कहना यही है। तुलना करता घूम रहा हूं। ध्यान और साधना का मार्ग वे बताते हैं, विचार जहां फंसे हैं वहां टीवी स्क्रीन की तरह चित्र चलता है। इस प्रश्न का उत्तर चाहिए, नहीं तो भीतर प्रश्नचिह्न बना रहता है।
मैं हां कहूं या ना, इससे कैसे पता चलेगा? आप अपने पर बात कर रहे हो। कैसे पता चलेगा कि उसके बाद की बात में मैं ईमानदारी से बोल रहा हूं? तब पता चलेगा जब तुम पहुंचोगे। मेरी ईमानदारी या बेईमानी से तुम्हें लेना देना नहीं होना चाहिए। उतना ही पूछो जितना समझकर चल सको। मैं दो ही तरह से जवाब दे सकता हूं, या तो आते हैं या नहीं आते। कैसे पता चलेगा कि ईमानदारी से बोला? जब तुम उस स्थिति में होगे तब पता चलेगा। और उस स्थिति में होते तो पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ती। इस बात को समझो। मेरे लिए जवाब देना कठिन नहीं है, मैं दे सकता हूं। लेकिन इस जवाब का तुम्हारे जीवन में कोई मतलब नहीं है। आत्मज्ञानी को स्वप्न आता है या नहीं, इस प्रश्न का कोई मतलब ही नहीं।
आते हैं तो क्या होगा, नहीं आते तो क्या होगा? इस प्रश्न के उत्तर से तुम्हें कुछ हुआ नहीं। तुलना की बात यहां नहीं है। ज्ञान अपना होना चाहिए। एक ने कहा आते हैं, मैं कह दूं आते हैं या नहीं आते। दो में से एक होगा। इससे तुम्हें लाभ क्या हुआ? सब लोग इस बात को समझ लें।
जिसके सानिध्य में हो, उससे यह पूछो कि मैं आत्मज्ञान की स्थिति पर कैसे पहुंचूंगा। स्वप्न आते हैं या नहीं, मुझे उससे क्या मतलब। जहां तुम हो, वहां से आत्मज्ञान की स्थिति तक कैसे पहुंचूं, उसका मार्ग बताओ। उस पर काम करो। कैसे पहुंचोगे, यह देखो। जब पहुंच जाओ तब देख लेना कि स्वप्न आता है या नहीं आता।
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वीडियो: Sunday Q&A May 3, 2026 #Yogi · 2026-05-03