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प्रश्नोत्तर P6-0046 · भाग 6

एक शब्द और समय लेगा। एक बड़े पंथ में सूरत शब्द योग है, सूरत को उन्होंने आत्मा का नाम दिया है। मैंने निर्विकार का चुनाव किया, फिर शब्द योग पकड़ा, क्योंकि शास्त्रों में शब्द की बहुत बात है। अलग अलग स्तर पर अलग शब्द बताते हैं। अनुभव में शब्द और ध्वनि भीतर प्रकट हो गई। एक को बताया तो बोले ध्वनि अभी बदलेगी। बहुत साल हो गए, ध्वनि नहीं बदल रही। शास्त्र में यही था कि हर किसी की अवस्था एक जैसी नहीं होती। अगर ध्वनि नहीं पलट रही तो इसका मतलब यह नहीं कि मूल से जुड़े नहीं हो, चल नहीं रहे। फिर असमंजस हो जाता है कि शब्द योग से वहां तक पहुंचा जा सकता है, या सीधे निर्विकार अवस्था पर कैसे पहुंचा जाए। शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे कहा गया है, पर ध्वनि में भी शब्द है। ध्वनि कहीं से आ रही है, किसी के द्वारा सुन रहा हूं, सूक्ष्म में। बाहर और भीतर अलग लगते हैं। यह स्थिति कब आएगी?

एक और बात में समय बर्बाद होगा, यह मैं देख रहा हूं। आपने एक से रास्ता पूछा, उसने बताया। दूसरे से पूछा, उसने बताया। अब देखना है कि मैं किस रास्ते से जा सकता हूं, मेरी क्षमता किसमें है। उन्होंने एक रास्ता बताया, जितनी उनकी समझ थी। आपने वह समझ लिया। मैंने एक रास्ता बताया। अब यह काम तुम करो। देखो मैं किस पर चल सकता हूं और कौन मुझे पहुंचा सकता है। यह तुम्हें तय करना पड़ेगा। स्कूल में एक समय मां बाप ले जाते हैं, एडमिशन हो जाता है, स्कूल तुम पर भार नहीं डालता, पढ़ाता है। फिर समय आता है, पूछता है अब कौन से विषय से पढ़ोगे। यह स्कूल तय नहीं करेगा, तुम तय करोगे। तय नहीं करोगे तो वहीं निकाल दिया जाएगा। उस समय विकल्प दिया जाता है कि किस विषय से क्या बनना चाहते हो। तुम कहो मैं नहीं तय करूंगा, आप तय करो, तो स्कूल तय नहीं करेगा। वहीं रुक जाओगे। तुम जा जाकर देख चुके हो। अब तय करो किस मार्ग से कल्याण होगा और मेरी क्षमता किस मार्ग में है। इतनी बुद्धि विकसित नहीं है कि कौन सा मार्ग अच्छा है, यह अभी डिसीजन नहीं ले सकते, तो रुक जाओगे। बढ़ोगे नहीं, और हर विद्यालय से भगा दिए जाओगे। विषय का चुनाव नहीं करोगे तो कहीं टिकने नहीं देंगे। जब तक ध्वनि है, तब तक उसमें शब्द ही है। जब तक ध्वनि है तब तक पहुंच ही नहीं सकते। उस ध्वनि से भी मुक्त होना पड़ेगा। शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे है वह। यह स्थिति तब आएगी जब पूरी तरह उम्मीद से मुक्त होगे। ध्वनि की भी उम्मीद है, चाहे वह कहीं से भी आ रही हो, तो भी द्वैत में फंसे हो। कह सकते हो कि सूक्ष्म से सुन रहा हूं, क्योंकि इतना पता नहीं। कान से सुन रहा हूं, यह जरूरी नहीं। भीतर की है, तो भी कहीं से सुन रहा हूं। बाहर हो या भीतर, बाहर और भीतर अलग अलग नहीं हैं। बाहर जो तत्व है वही अंदर है। इस फूल का एक पत्ता तोड़ो, आगे और पीछे दोनों तरफ तत्व एक ही है। नीचे वाला तत्व अलग थोड़ी है। एक ही है, दिखने में फर्क है। उसी को देखना है जो अभी नहीं देख पा रहे। मैं जैसे भी सुन रहा हूं, ये कान दिख रहे हैं, वे कान नहीं दिख रहे, पर वे भी कान ही हैं एक तरह से, जिनके द्वारा सुन रहा हूं। वह द्वारा बदलेगा और जिससे आ रहा है वह भी बदलेगा, तो भ्रम होगा। इसलिए कहा गया कि शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे। ध्वनि भी एक शब्द है। ध्वनि से भी मुक्त होना है। यह कब होगा? जब निर्विकार हो जाओगे। जब कोई उम्मीद नहीं रहेगी। उम्मीद नहीं रहेगी तभी अपने आप में स्थिर हो पाओगे। तुम्हारी कितनी उम्मीदें हैं, तुम्हें खुद पता नहीं। इसलिए एक एक उम्मीद तोड़ो। यह उम्मीद बनी तो क्यों बनी, इसका कारण क्या है। अभी यह उम्मीद है कि आत्मज्ञान के बाद स्वप्न आते हैं या नहीं। इस उम्मीद से मिलने वाला कुछ नहीं। यह उम्मीद जिंदगी भर ज्ञान नहीं होने देगी, क्योंकि प्रश्न वह रखा जो आत्मज्ञान के बाद का है। प्रश्न यह होना चाहिए कि आत्मज्ञान तक कैसे पहुंचूं। उस स्थिति पर पहुंचने के बाद खुद देख लूंगा। दूसरा दिखाएगा नहीं, सिर्फ बता सकता है। बताने से पहुंच नहीं जाओगे। स्वप्न आता है या नहीं, यह कह देने से आत्मज्ञान नहीं होगा। तुम आत्मज्ञान के बाद की स्थिति पूछ रहे हो। आत्मज्ञान तक पहुंचने के बाद देख पाते। स्थिति तक पहुंचने के लिए काम करो। स्थिति के बाद की बात ही मत करो। मैं उस स्थिति तक कैसे पहुंचूं, यही पूछो। वहां तभी पहुंचोगे जब शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे होगे। और यह तब होगा जब उम्मीद से मुक्त हो जाओगे। जब तक उम्मीद है तब तक इन्हीं में हो। एक एक उम्मीद तोड़ो। आध्यात्मिक प्रश्न एक ही है। मुझे आत्मज्ञान कैसे हो जाए। स्वयं से कैसे। बस यही एक प्रश्न है, पहला भी और आखिरी भी।

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वीडियो: Sunday Q&A May 3, 2026 #Yogi · 2026-05-03