प्रश्नोत्तर P6-0048 · भाग 6
आपने एक संकल्प कहा है कि निर्विकार होना है। निर्विकार कैसे होऊंगा, और विकार बन कैसे रहे हैं? बेईमानी छोड़ दूं तो आगे बनना बंद होगा, पर पिछला जो जमा किया है वह कैसे खटेगा? बेईमानी से श्राप मिला, तो सत्कर्म और जरूरतमंद की सेवा से क्या मिलेगा? प्रतिदिन जो विकार हो रहे हैं, उन पर हर क्षण कैसे ध्यान रखूं? प्रश्न पर प्रश्न मन उठाता रहता है, उन्हें ज्यादा नहीं उठने देना है या नहीं?
निर्विकार कैसे होऊंगा, यह अब देखना है। धारणा बना ली। धारणा के बाद काम ही करना पड़ेगा। संकल्प किया, अब देखो कि निर्विकार कैसे बनूंगा, और विकार कैसे बन रहे हैं। बन रहे हैं बेईमानी से। पहले बेईमानी छोड़नी पड़ेगी। निर्विकार की धारणा रखो। आगे बनना बंद हुआ, पर पिछला जमा कैसे खत्म होगा, यह भी प्रश्न है।
मेरे द्वारा बेईमानी हुई, दुष्कर्म हुआ, वह जमा हुआ। जब किसी से बेईमानी की तो श्राप मिला। अब किसी के साथ सत्कर्म करूंगा, जरूरतमंद की सेवा करूंगा, तो आशीर्वाद मिलेगा। वह आशीर्वाद उस श्राप को काटेगा। पहले यह धारणा बनानी है कि मुझे निर्विकार होना है। उसके लिए ईमानदारी अपनानी है। ईमानदारी अपना लोगे तो आगे का बंधन नहीं बंधेगा। पिछला बंधन खत्म करने के लिए सत्कर्म करना पड़ेगा। आगे बंधन न बंधे, इसके लिए सत्संग सुनते रहना पड़ेगा।
यह वैसे ही है जैसे भोजन ग्रहण करते रहते हो। आज खूब खा लूं और एक हफ्ते नहीं खाऊंगा, ऐसा नहीं चलता। उस हिसाब से काम नहीं कर पाओगे। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग ग्रहण करते रहो। कब तक? जब तक वहां पहुंच नहीं जाते।
विकार पर हर क्षण ध्यान रखना है। जब भी तुम्हारे द्वारा कर्म हो रहा है, पहले विचार आता है। जरूरत होती है, विचार आता है। मेरी जरूरत, किसी और की जरूरत, या मान की जरूरत। इसी में कर्म होता है। विचार आए तो देखो, मुझे इससे क्या लाभ होगा। लाभ होगा तो किसी की हानि तो नहीं होगी। मुझे लाभ हुआ और जिसकी हानि होगी, उससे श्राप मिलेगा, फिर गिर जाऊंगा। कर्म से पहले जांच लो। ईमानदारी से ही करना है।
प्रश्न पर प्रश्न उठाते रहोगे तो मन फंसाता चला जाएगा। मन प्रश्न बहुत करता है। प्रश्न कहां करोगे। एक ही प्रश्न उठाना है। मैं कोई भी काम पूरी ईमानदारी से करूंगा, और इसका परिणाम क्या आएगा, वह देखना है। ऐसा तो नहीं कि मेरे कर्म से समाज को तकलीफ हो। ऐसा काम मत करो। भीतर प्रश्न ज्यादा नहीं उठने देने हैं। इसी पर ध्यान रखो कि जो हो रहा है, मेरी जरूरत में है, या अपने लोगों की जरूरत में, या मान की जरूरत में। इस जरूरत की पूर्ति से मेरा क्या होगा और समाज का क्या होगा। एक तुम हो, एक सामने है। दोनों को देखना है। दोनों का लाभ देखने वाला आध्यात्मिक है। केवल अपना देखने वाला भौतिकवादी है, उसी को गृहस्थी कहा गया है। दोनों का लाभ देखने वाले का कल्याण होगा। केवल अपना कल्याण देखते हो तो भौतिकवादी हो। जब भी कर्म हो, देखो कि मेरे द्वारा किसी को हानि ना हो।
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