प्रश्नोत्तर P6-0049 · भाग 6
निर्विकार के इन साधनों में ब्रह्मचर्य का भी कुछ महत्व है या नहीं? भीतर विकार चलते रहें तो क्या अपने प्रति ईमानदार कहा जा सकता है? ईमानदारी अपना लेने के बाद भी पिछला विकार बहुत जमा है, उसे खत्म करने का क्या उपाय है? कर्म तो शरीर रहते होता ही रहेगा। अपने तरीके से चाहिए, यही चाहना भी बेईमानी है या नहीं?
ब्रह्मचर्य आपका होना चाहिए। एक होता है शरीर का ब्रह्मचर्य, एक होता है आपका ब्रह्मचर्य। आपका ब्रह्मचर्य जरूरी है। मानसिक कर्म में ईमानदारी, वही आपका ब्रह्मचर्य है। वही लोगों ने छोड़ दिया, इसीलिए ग्रसित हो गए। ईमानदारी आपका ब्रह्मचर्य है।
शरीर का ब्रह्मचर्य रखोगे तो शरीर में ताकत बढ़ेगी। बेईमान हो तो उस ताकत को कहां लगाओगे? बेईमानी और बढ़ जाएगी। दो ही रास्ते हैं। या तो वह ऊर्जा बेईमानी में लगेगी, या सही मार्ग पर लगेगी। शरीर में ताकत आ गई तो और तेजी से बेईमानी करोगे। इसलिए तुम्हारा ब्रह्मचर्य जरूरी है, और वह ईमानदारी है। ईमानदार हो तो ब्रह्मचारी हो। कृष्ण भगवान की प्रेमिका भी थी, तीन पत्नियां भी थीं, बच्चे भी हुए, फिर योगी कैसे कहलाए? ब्रह्मचर्य ईमानदारी है। यह तुम्हारे लिए जरूरी है।
जब तक बेईमानी कर रहे हो, तब तक अपने प्रति ईमानदार नहीं हो। ईमानदारी अपना ली तो आगे विकार जमा नहीं होगा। पिछला खत्म करने का उपाय चाहिए, पिछला बहुत जमा है। वह सत्कर्म से खत्म होगा। आग तब तक जलती है जब तक लकड़ी जाती रहे। डालना बंद कर दो तो आग बुझ जाएगी। ईमानदारी आग है। जितनी गंदगी है उसे जलाने के लिए कुछ डालना पड़ेगा। आग लगा दी, ईमानदारी अपनाई, पर जलेगा कैसे? ईंधन चाहिए। सत्कर्म ईंधन का काम करता है। कर्म के प्रति सचेत रहना ही ईमानदारी है। जब कर्म हो, उसमें छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता और पाखंड नहीं होना चाहिए। केवल ईमानदारी हो। पिछला जलाना है, जमा विकार खत्म करना है, तो सत्कर्म करना पड़ेगा। आग लग गई, जलाने को कुछ चाहिए, नहीं तो आग बुझ जाएगी।
कर्म तो होता ही रहेगा जब तक शरीर है। कर्ता में हो या अकर्ता में, कर्म हो ही रहा है। महात्मा के द्वारा भी कर्म होता है। एक कर्ता बनकर कर रहा है, एक अकर्ता में कर रहा है। अकर्ता कर्म करते हुए बंधन में नहीं फंसता, आनंद में है। जिसने अपने आप को कर्ता समझा, और मेरे तरीके से ही चाहिए, वह करता रहता है और बंधन में फंसता जाता है।
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