प्रश्नोत्तर P6-0075 · भाग 6
माता जी ने बताया कि लगभग डेढ़ साल तक वे ऐसी स्थिति में रहीं, जिसमें अपने आप को सब में और सबको अपने आप में देखती थीं, और उसी को आत्मसाक्षात्कार मानती थीं। उसके बाद फिर बहिर्मुख दुनिया में लौट आईं। क्या एक बार आत्मा का साक्षात्कार हो जाने के बाद मनुष्य दोबारा लौट आता है, या हम अपने बनाए हुए भाव से उस साक्षात्कार को खड़ा कर लेते हैं? और क्या यह बात ठीक है कि मैं सब में हूं और सब मुझमें हैं?
साधना में व्यक्ति जाता है तो एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि कुछ नहीं चाहिए। लेकिन उस स्थिति में अगर वह टिका रहा, तो उसके बाद उसको आत्मसाक्षात्कार होगा। ज्यादातर लोगों के साथ यह होता है कि उस स्थिति से लौट आते हैं। निन्यानवे प्रतिशत लौट आने वाली कहानी है। होता यह है कि भाव बनाया, मुझे कुछ नहीं चाहिए। नाम, शोहरत, पैसा, सब देखने के बाद कह रहा है, मुझे कुछ नहीं चाहिए। कुछ समय के लिए वह “मुझे कुछ नहीं चाहिए” चला जाता है, लेकिन टिक नहीं पाता। जैसे माता जी ने कहा कि मैं अपने आप को सब में देखती थी, अपने आप में भी और सब में अपने आप को देखती थी। यह भाव बनाया हुआ भाव होगा।
सब में न तो मैं हूं, न मुझमें कोई है। सीधी सी बात है। सब एक जैसे हैं। एक मूल केंद्र है जहां सब एक जैसे हैं। लेकिन न तो मैं किसी में हूं, न मुझमें कोई है। यह बहुत बड़ी भ्रांति है। इस भ्रांति को हटा दो। भ्रांति कौन सी? कि मैं सब में हूं, सब मुझमें है। अगर मैं सब में हूं और मुझमें सब है, तो किसी को समझाने की जरूरत ही नहीं होती। इतने महापुरुष हुए, वे अपने स्व में स्थिर हुए। अगर वे आप में होते, तो आपको समझाने की जरूरत ही नहीं होती। आप अलग थे और वे अलग थे, तभी तो आपको समझाया। इस बात को बहुत गहराई से समझो। हमारे सामने इतनी रटी-रटाई बातें आ गई हैं, जिनको लेकर मैं ढूंढ रहा हूं कि भैया, सब में मैं हूं और मुझमें सब है। ऐसा कुछ भी नहीं है।
स्व और भाव को अलग समझो। स्व एक जैसा है, एक नहीं है। हम एक जैसे हैं, एक से हैं। मूल केंद्र सबका एक है। मूल एक जैसे हैं। सबका आधार एक हो सकता है, लेकिन हैं वे सब अलग-अलग। स्व एक जैसा है, भाव सबका अलग-अलग है। भाव सबका भिन्न-भिन्न है। स्व एक जैसा है, लेकिन एक नहीं। स्व में स्थिर होने के बाद भी आप यह नहीं बोल सकते कि मैं सब में हूं, सब मुझमें है। क्योंकि वह सबसे अलग निकला, तभी तो अपने स्व में स्थिर हुआ। अभी भी आप लोगों में हो, लेकिन कामनाओं में हो, दायरे में हो। सब में नहीं हो, कुछ लोगों में हो। वही परेशानी का कारण है, और उसी से निकलने के लिए काम कर रहे हो। आज अगर आप निर्विकार की बात करते हो, तो आप विकारों में, लोगों में, कामनाओं में लिप्त हो। वह दायरा कुछ लोगों का है। आप वहीं से निकलने का प्रयास कर रहे हो। जब उन लोगों में से निकलोगे, स्व में स्थिर होगे, तभी आत्म का बोध होगा, आत्मज्ञान होगा। ये रटी-रटाई बातें बोलने में बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन है नहीं ऐसा। खुद इस पर चिंतन करो, नहीं तो और भ्रमित हो जाओगे।
एक सीखने वाला है, एक सिखाने वाला है। सिखाने वाला सीखने वाले को इसलिए सिखा रहा है कि वह उसके जैसा नहीं है। अब यह कहो कि सिखाने वाला इसलिए सिखा रहा है कि तुम भी मेरे जैसे बन जाओ। लेकिन बनने के बाद भी तुम अलग रहोगे। ज्ञान लेकर एक जैसे हो जाओगे, हां, एक जैसे हो जाओगे, लेकिन तुम अलग और मैं अलग। एक जैसे हो जाओगे, लेकिन ऐसा नहीं कि तुम मुझमें और मैं तुममें। ये सब रटी-रटाई बातें हैं।
जब हमने किसी रूप को देखा, चाहे वह कैसा भी रूप हो, विराट हो, कुछ भी हो, तो देखने वाला और जिसे देखा जा रहा है, दोनों अलग हैं। अगर मैं कह रहा हूं कि मैंने किसी विराट रूप को देखा, तो देखने वाला और विराट रूप दोनों अलग हुए, भिन्न हो गए। और अगर मैं यह कह रहा हूं कि मैं ही विराट रूप हूं, तो फिर देखा कहां? दर्शन, दृश्य और दृष्टा। जब तक कुछ दिख रहा है, जब तक आपने देखा, तब तक आप दर्शन में हो। और जब तक दर्शन में हो, आत्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता, क्योंकि आप रूप में हो। वह भी एक स्थिति है, ऊपर की। होता भी है, ऐसा नहीं है। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, अनेक ऊर्जाएं दिखने लगेंगी। लेकिन मुझे उस अनुभव में कभी रुकना नहीं है। मुझे यह इच्छा नहीं रखनी है कि वह अनुभव दोबारा आ जाए। अगर मैंने इच्छा रखी, तो मैं वहीं रुक गया। इससे भी ऊपर कुछ है। वहां तुम रुक गए, फिर तुम्हारी यात्रा वहीं रुक गई। रूप, शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे जाना है।
इस शरीर से देखें तो हमारे लिए आसमान भी एक विराट रूप है, क्योंकि हमें उसका आदि-अंत दिखता ही नहीं। पृथ्वी भी हमारे लिए विराट रूप है, क्योंकि पूरा रूप दिखता नहीं। अगर आप देखोगे, तो आपके लिए कण भी एक विराट रूप है, क्योंकि कण को भी आप पूरी तरह एक बार में नहीं देख सकते। कोई भी छोटा-से-छोटा कण ले लो, एक तरफ देखोगे तो उसके कई हिस्से छिप जाएंगे। वह भी हमारे लिए विराट रूप है। मुझे इस विराट रूप से परे उठना है। सामने कोई एक ऐसी चीज बता दो जिसे आप पूर्णतया देख सकते हो। क्या है कोई चीज? उलट-पलट कर एक-एक भाग देखोगे तो कितने भाग छिप जाएंगे। एक बार में कोई भी छोटा-से-छोटा कण ले लो, क्या उसे पूरा देख सकते हो? तो आपके लिए वह भी विराट है। विराट वही है जिसका न आदि है न अंत। एक कण उठा लो, वह भी विराट है, उसे भी आप पूरा नहीं देख सकते। विराट रूप से भी ऊपर उठना है, क्योंकि जिसे मैं देख रहा हूं, देखने वाला और जिसे देख रहा हूं, अलग है। दृष्टा जब तक दर्शन में है, किसी को देख रहा है, तब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ। मुझे उस रूप से भी परे उठना है।
जिसे मैं पूरी तरह देख नहीं पाऊंगा, वही विराट है। तो आपके लिए आपका शरीर भी विराट है। आपका एक-एक बाल भी आपके लिए विराट है, क्योंकि आप उसे भी पूरा नहीं देख सकते। तो आप खुद एक विराट हो। मुझे इस चक्कर में नहीं पड़ना है। ऊपर जाना है। इसे छोड़ेंगे तो ऊपर जाएंगे, देखने से और दिखने से। मुझे मुक्त होना है। मुझे देखने-दिखने की इच्छा न रहे कि मुझे कुछ दिख जाए। देखने से मुक्त होना है। अपने अंदर यह इच्छा न रखें कि मुझे कुछ दिख जाए।
अगर जरूरत है तो उपयोग करके आगे बढ़ूं। न देखने में फंसना है, न दिखने में फंसना है। मुझसे मतलब ही नहीं। मुझे सिर्फ अपने काम से मतलब है। न किसी को देखना है, न दिखना है। मुझे यात्रा करनी है अपने स्व तक। और स्व की यात्रा तभी होगी जब आप दर्शन के भाव से मुक्त होंगे, चाहे विराट रूप का दर्शन हो। विराट के बारे में मैंने बता दिया कि आप खुद एक विराट हो। खुद का भी तो दर्शन नहीं हो पाया। अगर शरीर को ही अपना आप समझते हो, तो शरीर का भी दर्शन नहीं कर पाए।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31