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प्रश्नोत्तर P6-0076 · भाग 6

आज्ञा चक्र पर अंतरचक्षु से अपने को देखकर यह भाव बनाया जाता है कि मैं एक आत्मा हूं, और उसी भाव में टिके रहने की कोशिश की जाती है, ताकि आत्मदर्शन हो। क्या यह तरीका ठीक है? क्या विराट रूप आत्मा के अंदर समा सकता है? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं पवित्र आत्मा हूं, ऐसा कहते रहने से मनुष्य पवित्र हो जाता है?

इसमें रुकना नहीं है। जो स्थिति आप बता रही हैं, वही स्थिति बनाई हुई है, क्योंकि मैं कह रहा हूं कि मैं एक आत्मा हूं। जो बोल रहा है कि मैं एक आत्मा हूं, वह अलग है। मैं आत्मा हूं, यह बोल रहा हूं। अगर मैं आत्मा हूं, तो मुझे बोलने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? जैसे आपका नाम गोदावरी है। आज तक इतनी उम्र में आपने कभी अपने आप से कहा कि मैं गोदावरी हूं? नहीं कहा, क्योंकि आप गोदावरी हो। आप इस बात को पहले साफ कर लीजिए। आप गोदावरी हो, इसलिए आपको यह कहना कभी नहीं पड़ता। लेकिन कोई पागल हो जाता है, याददाश्त चली जाती है, तो उसे याद दिलाया जाता है कि तुम यह हो, वह यह हैं। जिस दिन मुझे इस बात का बोध हो गया कि मैं आत्मा हूं, तो मुझे कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं जब तक कह रहा हूं, उसमें स्थिर होना चाहता हूं। आत्मिक स्थिति में आना चाहते हो, लेकिन यह तरीका एकदम गलत है। यह तरीका आपको वहीं का वहीं ले जाकर खड़ा कर देगा, कि मैं एक आत्मा हूं। कुछ दिन में रटी-रटाई बात हो जाएगी। मैं एक आत्मा हूं, मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं पवित्र आत्मा हूं। यह कहने से कुछ भी नहीं होने वाला। एक आदत पड़ जाएगी, रट्टा पड़ जाएगा, और फिर कोई मतलब भी नहीं रहेगा। आप धीरे-धीरे कमजोर भी होते जाओगे, क्योंकि आपकी ऊर्जा वहां लग रही है। कुछ करना नहीं है, बस इतना कहना है कि मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं पवित्र आत्मा हूं। उस पवित्रता के लिए, उस शुद्धता के लिए काम करना पड़ेगा। यह आलसी लोगों का काम है। बड़ा अच्छा लगता है, मैं शुद्ध आत्मा हूं, पवित्र आत्मा हूं। लेकिन यह कहने से कुछ होगा क्या? क्योंकि मैं पवित्र नहीं हूं, मैं शुद्ध नहीं हूं, इसीलिए बोल रहा हूं। अगर मैं होता, तो बोलने की जरूरत नहीं पड़ती। उस पवित्रता के लिए, उस शुद्धता के लिए मुझे काम करना पड़ेगा। और वह मेरे कर्म से हो सकता है, क्योंकि कर्म से मैं गंदा हुआ हूं। वृत्तियां कैसे धारण कीं? गंदगी कैसे धारण की? कर्म से। मैंने कर्म करते हुए गंदगी को धारण किया। मैं अपवित्र कैसे हुआ? कर्म करके। तो कर्म करके ही शुद्ध होऊंगा, पवित्र होऊंगा। यह कहने से कुछ नहीं होने वाला। एक व्यक्ति बैठ जाए और कहे, मैं राजा हूं, मैं राजा हूं। आपको लगता है कभी वह राजा बन सकता है? पागलखाने जा सकता है। तो आप पागलखाने मत जाइए। मैं आपको यही सलाह दे रहा हूं। बहुत लोग बहुत लोगों को पागलखाने भेज रहे हैं। मैं अध्यात्म में आया तो बहुत रोता था। मैंने कहा, मेरी बात कौन मानेगा? क्योंकि मुझे ज्ञान तो नहीं हुआ था, लेकिन इतना पता था कि यह गलत बता रहे हैं। यह व्यक्ति उस स्थिति में कभी नहीं आएगा, जो यह तरीका बता रहे हैं कि मैं शुद्ध आत्मा हूं। आप शिक्षक रही हैं। एक बालक से कह दो, बोलो बेटा, मैं शिक्षक हूं, मैं शिक्षक हूं। क्या बिना शिक्षा लिए, बिना पढ़े, वह शिक्षक हो सकता है? उसके लिए अध्ययन करना पड़ेगा, पढ़ाई करनी पड़ेगी। तो यह सब बातें छोड़िए। काम करना पड़ेगा। रास्ता बहुत साफ है। मुझे कर्म करने का मौका मिला और मैंने बेईमानी को धारण किया, मैं अपवित्र हो गया। अब मैं ईमानदारी को धारण करूंगा, सत्कर्म करूंगा, सत्संग सुनूंगा, और अपने आप को पवित्र कर लूंगा। बहुत आसान रास्ता है, और यह समझ में भी आता है। कितने लोग डिप्रेशन के शिकार हुए हैं। कितने लोग संस्थाओं में डिप्रेशन के शिकार हो गए हैं। बस पवित्र आत्मा की बात करके उनके पास बैठकर बात करिए, रोते हैं। उन्हें कुछ नहीं मिला। बोल रहे हैं, चालीस साल उम्र बीत गई, किसी का बुढ़ापा आ गया, मिला कुछ नहीं। आई एम सोल, पवित्र आत्मा, क्या-क्या बुलवाते हैं। आप खुद सोचिए, ऐसा हो सकता है क्या? जब तक आप करोगे नहीं, होगा नहीं। बड़ा सरल लगा कि बोलो, इसमें कुछ करना तो है नहीं। आपको भी लगा कि मैं पवित्र आत्मा बोलूं। अगर कुछ अपवित्र है, तो कपड़ा ही ले लीजिए। कपड़ा पहनकर गंदा हो गया और आप उसे धो नहीं रहे, कह रहे हो कपड़ा शुद्ध है, कपड़ा पवित्र है। कपड़ा और गंदा हो जाएगा। क्या आपको लगता है बोलने से कपड़ा शुद्ध हो जाएगा? एक वस्त्र ले लीजिए, पहनकर घूम लीजिए, गंदा हो जाए, उसे हाथ में ले लीजिए और रोज सुबह-शाम बोलिए, कपड़ा शुद्ध है, कपड़ा पवित्र है। क्या उसकी गंदगी आपके बोलने से हट जाएगी? काश आप शुद्ध जल लेते, साबुन लेते, और उसे धो देते, तो साफ हो जाता। पूरी जिंदगी क्यों गवा रहे हो? यह बोलने से कुछ नहीं होगा, और यह समझ में भी आता है। आपको लग रहा है कि मैं आत्मा हूं, यह बोलने से आप आत्मा हो जाओगे। जब आप आत्मा हो, तो बोलने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? आत्मा के अंदर विराट स्वरूप बताते हैं। क्या विराट रूप आत्मा से छोटा है? अगर आत्मा में कोई है, तो आत्मा से छोटा ही होगा। उससे बड़ा कैसे समाएगा? एक पात्र में उससे बड़ा पात्र डालो, तो क्या उस पात्र में जा सकता है? नहीं जा सकता। तो आत्मा में आत्मा के अलावा कुछ नहीं है। आप खुद सोचो, विराट रूप आत्मा से बड़ा हो तो आत्मा में कैसे रह सकता है? एक पात्र में उससे बड़ा पात्र आप रख सकते हो क्या? यह बात समझ में भी आती है। एक उदाहरण देता हूं। दो लोगों ने अपराध किया, दोनों को सजा हो गई। दोनों ने एक ही तरह का काम किया था, दोनों को एक ही जैसी सजा हुई। लेकिन एक ने क्या किया? बस ध्यान लगाना चालू किया। अपना समय पर खाए और ध्यान लगाए, बैठा रहा। और एक ने क्या किया? पूरा सेवा भाव, सबकी सेवा करना, सबकी देखरेख करना, पूरा कामकाज करना। जल्दी कौन छूटेगा? जेल में काम करवाया जाता है, डंडे भी लगते हैं, यह समझ लो। शुद्ध आत्मा, शुद्ध आत्मा, मैं अपने आप में केंद्रित कर लूं। अरे, आप कहीं केंद्रित हो क्या? जब तक आप वहां से नहीं छूटोगे, आप यहां केंद्र में हो ही नहीं पाओगे। आप केंद्रित इसलिए करना चाह रहे हो कि मैं बैठूं और आत्मा में केंद्रित हो जाऊं। इसका मतलब आप कहीं केंद्रित हो। तो जहां आप हो, वहां से अपने आप को छुड़ाओ। रबर को यहां से खींचकर छोड़ोगे तो वह अपनी जगह नहीं टिकेगा। लेकिन अगर यहां से छुड़ा दो, तो अपनी जगह चला जाएगा। छोड़ने वाला काम करो। किसी विधि से जबरदस्ती कहीं लगा रहे हो। कुछ समय के लिए शांति मिलेगी, लेकिन छूटने के बाद कहां जाओगे? वही जाओगे, क्योंकि वहां से छूटे नहीं हो। ध्यान लगाने से थोड़ी छूट जाओगे। इसलिए कर्म के सिद्धांत को समझना बहुत जरूरी है। कर्म का सिद्धांत बताता है कि जैसा कर्म, वैसा परिणाम। सीधे कर्म के सिद्धांत पर आ जाओ।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31