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प्रश्नोत्तर P6-0081 · भाग 6

साधना काल में ऐसी कौन सी परीक्षाएं आती हैं, जिनका पहले से अनुमान नहीं हो सकता? जगह से निकाल दिया जाए, तौलिया चुराने का इल्जाम लग जाए, या धन और आश्रम का लालच दिया जाए, तब साधक कैसे रहे?

फिर जब ओंकारेश्वर में गया, क्योंकि मैं हर जगह छोड़ आया था, बहन का घर, हर जगह। तो ओंकारेश्वर में गया, घूमता रहा। अब मैं कहां रहूं, क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर एक बाबा थे, वहां रुक गया। अब बाबा की घटना बता रहा हूं। बहुत हंसी आई, बहुत रोना आया मुझे। बाबा बोले, रुक जाओ। रुक गया। सुबह पता नहीं क्या हुआ। उसका कोई तौलिया लेकर गया। बोला, तू मेरा तौलिया ले गया। अब मैं तो रोने लगा कि यार, आते-आते तौलिया पर अटक गया। अगर यह मुझसे कहे, तो मैं सौ-दो सौ तौलिया खरीदकर दे दूं। एक बार अगर यह मुझसे कहे, तो मेरी क्षमता अभी भी ऐसी है कि मैं एक नहीं, सौ-दो सौ दे दूं। और ओंकारेश्वर में ही रुकने का फैसला कर लिया था। उसने कहा, आपने मेरा ले लिया। बोला, बाबा। बोले, हम केस करेंगे, यह करेंगे। मैंने कहा, हे भगवान, मतलब कितना नीचे गिरा है। अगर यह बोलता, तो सौ-दो सौ तौलिया दे देता। अब आंखों से आंसू। उसको क्या जवाब दूं? क्योंकि इल्जाम लग गया। आप दो सौ तौलिया भी दे दो, कोई मतलब है क्या? अब रोने लगा। रोते-रोते वहां से चला गया। बोला, यार, तू भी रहने नहीं देगा। एक ही कपड़ा पहनते थे। बैग भी नहीं था। कुछ नहीं था। चुराओगे कहां? वही तो बात है। कहीं रख दिया होगा। फिर रोते-रोते वहां से निकला। बोला, अब कहां जाऊं। अभी इस जगह पर नहीं रह सकता, क्योंकि चोरी का इल्जाम लग गया, वह भी तौलिया का। बोला, यार, अब यहां भी तूने रहने नहीं दिया। अब मैं कहां जाऊं। मेरे पास तो जगह ही नहीं है। फिर वहां से निकला। ओंकारेश्वर से लगभग एक किलोमीटर ऐसे आया। मेरे पास एटीएम था। मुझे एटीएम से कुछ पैसे निकालने थे। पास वाले एटीएम में नहीं था, तो मैं पैदल दूर गया। वहां पैसे निकालना था। पैसा नहीं निकाल पाया। ऐसे रो रहा था, खड़े होकर, कि अब जाऊं कहां। इसलिए कि एक खोजी था। जा-जाकर हर जगह, आश्रम वगैरह में थक चुका था। सिर्फ रहने की जगह नहीं चाहिए थी। एक खोज थी, मिल नहीं रही थी। तो वहां अब कहां जाए, समझ में नहीं आ रहा था। क्योंकि हर स्थान से हट गया था, मानसिक भी, शारीरिक भी। लोग पसंद भी नहीं करते। स्थिति यह आ गई थी। मैंने इस समाज में देखा है, चाहे आपके पास धन हो, चाहे रूप हो, तभी आपको लोग पसंद करेंगे। कोई काबिलियत हो। अब पूरी तरह अध्यात्म में आ गया, तो मैं भौतिक वालों के किसी काम का नहीं रहा। न शरीर का उन्हें कुछ दे पा रहा हूं। वे मेरा रूप लेकर क्या करेंगे? उन्हें तो धन चाहिए। तो हर तरह से हट गया था। तो रोने लगा। ऐसे रोता खड़ा था। तो एक महाराज जी जा रहे थे। वहां से मुझे देखने लगे। मैं उन्हें देखने लगा। एक-दूसरे को देखते-देखते हम एक-दूसरे के पास गए। फिर वहीं पेड़ था। बैठे, बातें करने लगे। बातें करते-करते उन्होंने कहा, चलो मेरे साथ। वे बहुत त्याग की बातें करते थे। उनके पास एक फोन था। मैंने कहा, जब इतनी त्याग की बातें करते हो, तो फोन क्यों रखे हो? बोले, तो इसको फेंक दूं? आप बोलो तो। मैंने कहा, मैं बोलूं, फेंक दोगे? बोले, अभी फेंक देता हूं। तो मैं समझ गया, मेरी बात मान लेंगे। मैंने कहा, फेंको मत, रखो, कोई बात नहीं। फिर हम आगे गए। मुझे बहुत भूख लगी थी। मेरे अकाउंट में पैसे थे। मैं होटल में गया। पूछा, कार्ड से होता है? बोले, हां। फिर कहा, जाने दो। महाराज जी बगल में खड़े थे। आया, पूछा। बोले, जो मर्जी हो, खा लिया करो। उन्होंने कुछ नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद होटल वाले ने कहा, नहीं, हम पैसे नहीं लेंगे उनको। फिर उन्होंने मुझसे कहा, एक करोड़ में तुम्हारा आश्रम बन जाएगा। वही महाराज जी बोले। मैंने कहा, नहीं, मुझे एक करोड़ नहीं चाहिए। मुझे आश्रम नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ आत्मज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए। अगर मुझे कुछ चाहिए, तो सिर्फ आत्मज्ञान। उसके अलावा मुझे कोई बात ही नहीं करनी है। फिर हम बहुत आगे आए। बात करने लगे। एक महाराज जी हमें रोक रहे थे। बोले, हमारे आश्रम में रुक जाओ। मैंने कहा, कितने समय में ज्ञान हो जाएगा? बोले, बारह साल। फिर बोले, आपको छह साल में हो जाएगा। वे वहां बारह-चौदह साल से रह रहे थे। मैंने कहा, यार, जब बारह-चौदह साल में इनको नहीं हुआ, तो मुझे छह साल में क्या होगा? बोले, चलो यहां से। फिर आगे आए। एक दिन पूजा कर रहे थे, तो उन्होंने मेरा पांव छुआ। पांव छूकर बोले, मैं तुम्हारे अंदर कुछ देखकर तुम्हारे साथ चला हूं। मैंने भी उनका पांव छुआ, कि मैं भी आप में देखकर ही चला हूं। फिर जब आगे आए, तो उन्होंने कहा, तुम्हें पूरे भारत में कोई आत्मज्ञान नहीं करवा सकता। मैंने कहा, जब पूरे भारत में कोई नहीं करवा सकता, तो फिर आपको भी छोड़कर जा रहा हूं, क्योंकि आप भी तो इस भारत में हो। चला था उम्मीद से। जब आपने मना कर दिया, अब मैं जा रहा हूं। वही चल दिया। जब मुझे ज्ञान हुआ, तो मैं उस तौलिया वाले बाबा के पास गया, ओंकारेश्वर। क्योंकि वह बात खटक रही थी। मैं गया। बोला, बाबा, पहचाने मुझे? देखा। फिर मैंने कहा, मैं वही तौलिया वाला हूं। अरे, बोला, यार, तौलिया तो कोई और लेकर गया था। मैंने बिना मतलब तुमको बोल दिया। मैंने कहा, तुम्हारे बोलने से मुझ पर क्या बीती, वह तो मैं ही जानता हूं। बस इतना बोलकर निकल गए, कि तौलिया तो कोई और ले गया था, मैंने तुम्हें बोल दिया। लेकिन मेरे ऊपर क्या बीता, वह तो मैं ही समझ सकता हूं। फिर वहां से वह बात दिमाग से निकल भी गई। सच्चाई का पता तो चल गया। बड़ी परीक्षाएं होती हैं। ऐसी-ऐसी परीक्षाएं होती हैं कि तुम सोच भी नहीं सकते। तुम पर ऐसे इल्जाम, ऐसी बातें, ऐसा अपमान होता है कि होता है, यह क्या, मैं कर सकता हूं क्या? लेकिन सीधा सामने वाला कह रहा है, तुमने किया। और पूरी भीड़ उसके साथ है। एक भीड़ है उसके साथ। तुम सिर्फ अकेले हो। तुम्हारी कौन सुनेगा? क्योंकि तुम्हारे पास कुछ है ही नहीं। न कोई पावर है, न कुछ है। क्योंकि तुम परीक्षा में खड़े हो। एक परीक्षा वाले के पास कोई पावर नहीं होती। कोई समूह नहीं होता। जैसे एक विद्यार्थी परीक्षा में बैठ जाता है, तो उसके पास कोई पावर होती है क्या? बलहीन है वह। उस समय उसके साथ कोई नहीं। यही हालत होती है। और ऐसी परीक्षा होती है, सोच भी नहीं सकते। जैसे वह बाबा सुबह बोलता, तो दो-चार तौलिया लाकर दे देता। लेकिन उसने इल्जाम ही लगा दिया। तो तौलिया देने से उसकी छुटकारा नहीं होगी। लग गया न, इस समय। वह सोचेगा, हां, चोर बनता है, ईमानदार। बहुत तरह की परीक्षाएं होती हैं। बस इतना है कि आप अगर ईमानदार हो, और आत्मिक कल्याण की पूरी जिज्ञासा है, तो हर परीक्षा पास कर लोगे। यह मुझे पता है। अगर आपको कुछ नहीं चाहिए, सच में। आपके अंदर कोई लालच नहीं है। न कुछ बनना है, न नाम, न शोहरत, न पैसा। आप पक्का निकल जाओगे। अगर यह भाव प्रबल है, इस भाव पर टिके रहे, तो आप निकल जाओगे। अब देखो, मुझे वह बाबा एक करोड़ दे रहे थे। और वे बाबा ऐसे थे, झोली में से कितने पैसे कहां से निकालते थे, समझ में ही नहीं आता। वे बाबा उस लेवल के भी थे। अगर वहां लालच होती, तो जागृत हो जाती, कि चलो यार छोड़ो। झोली में एटीएम। पृथ्वी पर कहीं रहने की जगह नहीं है। बाबा दे ही रहा है, तो ले ले। बहुत सारी परीक्षाएं होंगी। और बहुत परीक्षाएं पार करनी हैं। निकलने वालों के लिए। अब कोई सिर्फ नाम लिखवाने की योजना कर रहा है, तो उसे परीक्षा नहीं होगी। अगर कोई नाम लिखवाने की योजना ही कर रहा है, तो उसे परीक्षा में बैठना नहीं है। बैठना भी चाहेगा, तो नहीं बैठने दिया जाएगा। पहले कक्षा में बैठो। बहुत विपरीत परिस्थितियां बनती हैं। बहुत अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं। एक बार तो ऐसी अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं कि लगेगा, मैं तो भगवान हूं। सामने वाला ऐसा मिल जाता है कि वह एक ही क्षण में तुम्हें भगवान बना देता है। वह इतना सेवा करने लगता है कि ऐसा लगता है, मैं ही भगवान हूं, मैं ही सब कुछ हूं। जितनी विपरीत परिस्थितियां, उतनी अनुकूल परिस्थितियां। ऐसा लगता है, मैं ही भगवान हूं। इतना सामने वाला सम्मान देता है। इतना फूलों की तरह बैठाता है। मतलब क्या चाहिए तुम्हें, बताओ। क्या खाओगे, क्या पियोगे, कैसे रहोगे। सोच भी नहीं सकते। और फिर एक विपरीत परिस्थिति ऐसी आती है कि भैया, तौलिया कहां ले गए। अब मैं नया था, वह पुराना था। ले जाने वाला पुराना आदमी था। मैं एक ही दिन गया था, रात एक रात बीती थी। तो मुझ पर शक की संभावना भी थी। अगर देखा जाए, तो वह भी दोषी नहीं। बोल सकते हैं। वह यह तो देख लेता, अगर चुराया भी है तो उसी के आश्रम में कहीं होगा। बैग ही नहीं है इसके पास। मैंने कहा, कपड़े, यह सब कुछ है। ढूंढ ले भैया। अगर इसके अंदर हो, तो नंगा भी हो सकते हैं। अगर कभी उस तरफ चलना होगा, और वह बाबा होगा, तो मैं मिलाऊंगा आप लोगों को। ओंकारेश्वर चलेंगे, परिक्रमा मार्ग में है वह। अगर वह रहा, तो हम मिलेंगे। उस समय लाइव वालों को भी दिखाएंगे। याद तो होगी। वह कभी नहीं भूल सकता। क्योंकि मेरा कपड़ा, पहनावा, वह तौलिया, मेरा रोना, नहीं भूल सकता। बहुत परीक्षाएं होती हैं। सोच भी नहीं सकते।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31