प्रश्नोत्तर P6-0084 · भाग 6
अपनों की कुटिया की तरफ से पुकार हो रही है, फिर भी लोग नहीं आते। यह पुकार कब तक रहेगी? और जब आपको कहीं ठिकाना नहीं मिलता था, रात-दिन का भरोसा नहीं था, तब आपको अध्यात्म की ओर कौन बुला रहा था?
एक मेरा कर्म था, एक तुम्हारा कर्म है। तुमने जरूर कुछ सत्कर्म किया होगा। आप लोगों की यह बात मैं समझता हूं। आपके जीवन में कुछ तो सत्कर्म किया होगा, कि आपके अनुसार व्यवस्था मिल रही है, आपके अनुसार सत्संग मिल रहा है। मैं तो कभी-कभी तुलना करता हूं। मैंने कहा, यार, मैंने क्या किया था? क्योंकि एक दिन नहीं। दो हजार ग्यारह से दो हजार बीस तक का धिक्कार मामूली नहीं है। दो हजार ग्यारह से बीस तक मैं उस जगह रहता था, जहां रात बीते तो दिन का भरोसा नहीं, दिन बीते तो रात का भरोसा नहीं। चाहे मेरी बहन का घर हो, चाहे किसी का घर हो, चाहे कहीं भी रहो। रात बीते तो सुबह का खतरा, सुबह बीते तो रात का खतरा। यही बना रहता था। कभी-कभी बहन के घर से भी रात को चल देता था। कभी-कभी वे ऐसा शब्द बोल देते थे। यह नहीं था कि बहन के यहां आज रात बीतेगी। एक कवर जा रहा है, मुंह तक जाएगा कि नहीं, पता नहीं। कौन सी बात बुरी लग जाए। इतने सालों का यह हाल। और बीस को छोड़ो। बीस के बाद भी।
मुझे भुंडा में ही ऐसे सोना पड़ा। दो चबूतरा थे। हनुमान जी का मंदिर था। जिधर मैं सोया था, उसे परिक्रमावासियों को कुछ बांटना था। मैं रात को दो-तीन बजे तक जागता हूं। जब सोया, तो सुबह ही आकर सात-आठ बजे मुझे जगा दिया। दूसरा चबूतरा था बांटने के लिए। उसी दिन वह हुआ, तो मैं गांव छोड़कर चला गया। आपको गजेंद्र जी को बताया था न, कि हम लोगों ने दोबारा बुलाया, इन्हें। वह मेरे सामने फिर बात करने आया। बोला, नहीं, आज के बाद तू बात नहीं करना, जा यहां से। तो ऐसा नहीं कि बीस के बाद नहीं हुआ। ज्ञान के बाद भी मेरे साथ ऐसा हुआ। क्योंकि दिन-रात बोलता रहूं, और फिर जब सोऊं। अब देखिए, दो चबूतरा। बड़ी आश्चर्य की बात है। उस पर भी बांट सकता था, लेकिन उसने मुझे उठाना उचित समझा। मैं बोल सकता हूं कि जब तक कुटिया के पहले, सोलह मई के पहले, दो हजार चौबीस तक, मैं बेघर ही रहा हूं। मेरी रात कहां बीतेगी। दिन में मुझे सोने दिया जाएगा कि नहीं। रात भर यहां सोऊंगा कि नहीं। यह भी नहीं पता। यह जिंदगी मैं दो हजार ग्यारह से इतने समय तक जिया।
तो इस मामले में मैं आप लोगों को भाग्यशाली समझता हूं, कि आपके अनुकूल परिस्थिति आपको मिली। तो जरूर इसके पीछे आपका कर्म है। और जो मुझे मिला, मेरे पीछे मेरा कर्म था। तो इस मामले में आपको सौभाग्यशाली समझता हूं। लेकिन मैं फिर भी सोच रहा हूं कि यार, आप लोग पुकार सुन ही नहीं रहे हो। मुझे कोई पुकारा नहीं, फिर भी मैं चल दिया। मुझे अध्यात्म की तरफ मोड़ने वाला एक भी आदमी नहीं है। न मेरे घर में है, न मेरे गांव में है, न मेरे क्षेत्र में। मैंने अपने अंदर से अपने आप को पुकारा, कि तुझे इस मार्ग में चलना है। और मेरे जीवन में एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं मिला। अगर कोई मिला, तो एक ही बात कही, कि जन्म-जन्म लगते हैं। बस एक वही, बद्रीनाथ के थे। उन्होंने कहा, तुम बहुत अच्छे संत हो। बद्रीनाथ की घटना बताई थी न।
तो मैं आप लोगों से कह रहा हूं, आप लोगों को कोई पुकार रहा है। आप लोगों को सुनाई नहीं दे रहा है। हो सकता है यह समय चला जाए, और फिर आप सोचो कि कोई पुकारे। पुकारने वाला ही चला जाए। पुकारने वाला भी कब तक पुकारेगा? आप ही देखो। किसी को बुलाना है, तो कितनी आवाज मारोगे? एक, दो, तीसरे में चेक करने लगोगे, क्या हुआ। या तो आवाज पहुंच नहीं रही है, या फिर जाओगे उसे खोजोगे। और पास जाकर पूछोगे, मेरी आवाज आई थी कि नहीं। अगर कहेगा, हां आई थी, तो क्यों नहीं आया। या तो तब छोड़कर चले जाओगे। या नहीं आई, तो अब आ गई, अब चलो। कहेगा नहीं, तो अब छोड़कर चले जाओगे। वह कब तक पुकारेगा। उसका भी तो एक समय है। निकल जाएगा। क्योंकि कैसे भी करके अपने आप को निकाला है। तो पुकारते-पुकारते चला जाएगा। ज्यादा दिन पुकारेगा नहीं।
मेरे समझ से पुकार सुनो, और अपने कल्याण में लग जाओ। आप लोग खाली हो, इसलिए बोल रहा हूं। अब इसको नहीं बोल रहा हूं, क्योंकि ये इधर भी लगे हैं, उधर भी लगे हैं। कुछ जिम्मेदारियां हैं इनके ऊपर। लेकिन आपके ऊपर थोड़ी है। आप जबरदस्ती जिम्मेदारी थोपे हो। पता नहीं क्या करना चाहते हो। क्या बनाना चाहते हो। अभी क्या बनाना है आपको? कुछ बनाना है? न कुछ बनाना है, न जिम्मेदारी सौंपी है। ट्रांसफर नहीं करी। पावर नहीं दी अपनी किसी को। तो पावर आपके हाथ में है, यह आपको लगता है। पावर आपके हाथ में है क्या? जो है, वह तो है ही। अगर पावर आपके हाथ में होती, तो आपने मुझसे कुछ बोला होता, तो करते न। आपके हाथ में छूछी चाबी है। मास्टर चाबी उधर है। आपके हाथ में बस चाबी है। मास्टर चाबी उनके पास है। तुम्हारे पास उतना ही चाबी है कि कुछ ताले खुलेंगे। उनके पास मास्टर चाबी है। वे हर ताला खोल देते हैं। और वे उतना ही ताला तुम्हें खोलने देंगे, जिसमें कुछ नहीं है।
जैसे दानपात्र रखा जाता है। तुम्हारे लिए दानपात्र रख दिया, कि बस तुम डाल सकते हो। निकाल सकते हो क्या? दानपात्र में डालकर निकालो, तो निकालने देगा क्या? मंदिर में जाओ, डाल दो, फिर निकालो। निकालने देंगे क्या? नहीं निकालेंगे। तुम्हारे पास वही है। तुम्हारे पास दानपात्र है। तुम सिर्फ डाल सकते हो। चाबी उनके पास है। जब उनको निकालना होगा, निकाल लेंगे। तुम सिर्फ डाल सकते हो। तब कौन सी पावर देकर आए? पावर तुम्हारे हाथ में नहीं है। लग रहा है कि आपको भ्रम है। पावर होती, तो आप अपनी मर्जी से कर सकते थे न, कुछ भी। जब हमारी मर्जी से हमें किया नहीं जाने दे रहा। हम अपनी मर्जी से नहीं कर पा रहे हैं। किया जाने दे रहा है। तो इसका मतलब पावर किसी दूसरे के हाथ में है। आपके हाथ में नहीं है। यही तो भ्रम है। आपके सामने दानपात्र है। सिर्फ डाल सकते हो, निकाल नहीं सकते।
अगर तुम सोचो कि दानपात्र में मैंने हजार डाल दिया, और तुम निकालने लगो, तुरंत दौड़कर आएंगे। बोलेंगे, क्या कर रहा है? बोलोगे, हजार डाला, सौ निकालूं। बोलेगा, चल, भाग। यहां सिर्फ डाल सकते हो, निकाल नहीं सकते।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31