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बचपन की इच्छा, ज्योतिष और फिर संन्यास
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 20:22 से
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मुख्य बातें
- जन्मभूमि उत्तर प्रदेश रही; बचपन से समाज के लिए कुछ करने की इच्छा थी।
- ज्योतिष भी किया, पर लगा कि इसमें नाम, शोहरत, पैसा ही है — इससे आगे कुछ है।
- संन्यास लिया तो उस समय सच में कुछ नहीं चाहिए था; आश्रम में तीन दिन में ही पंचायत दिखी।
जन्मभूमि से संन्यास तक
जन्मभूमि उत्तर प्रदेश रही। बचपन से समाज के लिए कुछ करने की इच्छा थी — मैं भी कुछ करूं, चाहे वह मान के लिए हो, सम्मान के लिए हो, पर कुछ करना था। ऐसे निकलते-निकलते फिर यह समझ में आया कि इस संसार में अगर हम एक-दूसरे को मानते हैं तो वहां लेनदेन है; लेनदेन नहीं है तो कोई किसी को नहीं मानता।
ऐसे काम करते-करते बाद में मैं ज्योतिषी भी हुआ। फिर उसमें भी लगा कि नहीं, यह पूर्ति नहीं है — इसमें भी नाम, शोहरत, पैसा, इससे ज्यादा कुछ नहीं। मुझे लग रहा था कि इससे आगे कुछ है। फिर मैं संन्यासी हो गया कि इसके आगे क्या है — यह संन्यासी होने के बाद ही पता चलेगा।
संन्यासी हुआ तो उस वक्त सच में मुझे कुछ नहीं चाहिए था। उस समय जिस व्यक्ति ने संन्यास लिया था, उसे कुछ भी नहीं चाहिए था। लेकिन जब आश्रम में गया, तीन दिन आश्रम में रहा, तो मैंने कहा कि जो मैं छोड़ के आया हूं, उससे ज्यादा तो यहां पंचायत है। मेरा रहना ज्यादा मुंबई में हुआ, परिवार भी मुंबई में रहा। तीन दिन बाद आश्रम से चला गया। अब करूं क्या, पता तो है नहीं।