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2011 जन्माष्टमी की दीक्षा — “गोविंद दास” नाम, और तीन गुरु
19 जुलाई 2026 · भगवान और परमात्मा में क्या अंतर है? · 2:37:06 से
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मुख्य बातें
- 2011 में कृष्ण जन्माष्टमी को मलाड के बागेश्वरी आश्रम (उदासीन बड़ा अखाड़ा) के महंत से दीक्षा ली; नाम पड़ा गोविंद दास।
- तीसरे दिन रोए और गुरु के पीछे घूमते रहे — “मुझे कराओ, नहीं तो दीक्षा क्यों दी?”
- तीन गुरु रहे — घर के एक चचेरे भाई, ज्योतिष के गुरु और संन्यास के गुरु; “सब छूट ही गए, बचा मैं।”
दीक्षा
गुरु ने हमें खुद छोड़ दिया, बोले — जाओ, सतगुरु ढूंढो। मुझे कोई बर्दाश्त ही नहीं कर पाता था। और जब तक उन्होंने यह नहीं बोला, तब तक मैंने उन्हें छोड़ा भी नहीं — कहता था, या तो कराओ, नहीं तो दीक्षा क्यों दी?
आज मैं बता भी देता हूं — उदासीन बड़ा अखाड़ा, मलाड में बागेश्वरी आश्रम है, वहां महंत पदवी पर पूनम दास जी महाराज हैं। उनसे मैंने 2011 में कृष्ण जन्माष्टमी को दीक्षा ली, मेरा नाम पड़ा गोविंद दास। फिर तीसरे दिन मैं रोया, और उनके पीछे घूमता रहा कि आपने मुझे दीक्षा क्यों दी, मुझे कराओ। उन्होंने कहा, देख, जन्म-जन्म लगते हैं। मैंने कहा, कोई तो जन्म आखिरी होगा — यही जन्म आखिरी है।
तीन गुरु
तीन गुरु रहे — एक तो घर में ही मेरे चचेरे भाई थे, वे गुरु बने। फिर एक ज्योतिष के गुरु हुए, और एक संन्यास के गुरु हुए। और सब ने — सब छूट ही गए; बचा मैं।