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गुरु से बात नहीं जमी — “41 दिन का पक्का कौन करेगा?”
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 21:53 से
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मुख्य बातें
- गुरु से कहा कि कुछ समझ में नहीं आ रहा; उत्तर मिला — धीरे-धीरे होगा।
- “माता के पास 41 दिन बैठ” — मैंने कहा, पहले यह पक्का करो कि मैं 41 दिन जीवित भी रहूंगा।
- मैं अशांत हूं, मेरे अंदर सब विकार हैं — पर इन्हें निकालने के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूं।
आश्रम आना-जाना
फिर आश्रम आना-जाना, गुरु से झंझट कि मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। बोले, धीरे-धीरे होगा। मैंने कहा, धीरे-धीरे कब होगा? फिर बाद में वे अवॉइड करते रहे। उन्होंने कहा कि जा, माता के पास बैठ, तुझे 41 दिन में बता देगी।
मैं बोला, पहले तो एक पक्का करो कि मैं 41 दिन जीवित भी रहूंगा। एक पल का ठिकाना नहीं, और अगर मैं बैठूं और उसी में चला गया तो क्या होगा? पहले यही मेरे जीवन में पक्का कर दो कि 41 दिन रहूंगा। तो उनसे बात जमी नहीं।
मैं बोला, बाद में यह मत बोलना कि भाव से नहीं बैठा — ज्यादातर यही होता है, बाद में कह देते हैं कि आपने भाव से नहीं किया। मेरा मन कहां रहेगा, मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं मन को स्थिर नहीं कर सकता — मेरी अभी यह क्षमता नहीं है। मेरे अंदर काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह सब है, मैं एकदम अशांत हूं।
“मैं ढूंढ लूंगा”
फिर उन्होंने कहा, कौन किसको कराया था, बता। मैंने कहा, रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को अनुभव कराया। बोले, तू स्वामी विवेकानंद नहीं है। मैं बोला, आपने तो पक्का कर दिया कि आप रामकृष्ण परमहंस नहीं हो; लेकिन मैं अबोध हूं, भटका हुआ हूं, अशांत हूं — कोई ऐसी कमी नहीं जो मुझमें नहीं है। लेकिन इस कमी को निकालने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं, किसी हद तक भी जा सकता हूं, यह भी मुझे पता है।
फिर उन्होंने कहा कि देख, तुझे जो चाहिए, मैं दे नहीं सकता। मैं बोला, मैं तो ढूंढ लूंगा, कहीं न कहीं ढूंढ लूंगा।