JY-0019 · खोज
ब्रह्मचर्य की आग और गुरु से झगड़ा — “इसी जन्म में चाहिए”
15 जून 2026 · हर मोड़ पर बदलाव है, वही तो ज़िंदगी है · 4:18 से
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मुख्य बातें
- 25-27 की उम्र, शरीर में बहुत ऊर्जा — ब्रह्मचर्य रुक नहीं रहा था; स्वामी विवेकानंद की तस्वीर से प्रेरणा मिलती थी।
- गुरु ने कहा “रुक जाएगा” — “बुढ़ापे में तो रुक ही जाएगा, अभी कैसे रुके?”
- कंठी गिर गई तो नहीं पहनी; “मुझे जांच लो — मैं पीछे हट जाऊं तो बोलना।” अब समझ आया कि ईमानदारी ही ब्रह्मचर्य है।
ब्रह्मचर्य
फिर हमारा गुरु जी से झंझट होने लगा। मैंने कहा, आपको मुझे दीक्षा देने की क्या जरूरत थी, अब मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या करूं। मैंने कहा, गुरु जी, मेरा ब्रह्मचर्य नहीं रुका। पहले तो मुझे ब्रह्मचर्य का पता नहीं था — मैं सोचता था शरीर का ब्रह्मचर्य ही ब्रह्मचर्य है। अब समझ में आया कि ईमानदारी ब्रह्मचर्य है।
तो मैं ब्रह्मचर्य पर ज्यादा फोकस करता था कि यह रुक जाए। स्वामी विवेकानंद की तस्वीर को देखकर प्रेरणा मिलती थी, लेकिन मैं वह कर नहीं पा रहा था, विवश था — शरीर में इतनी ऊर्जा थी। गुरु जी से पूछा तो उन्होंने कहा, रुक जाएगा। मैंने कहा, यह तो मुझे भी पता है कि एक समय ऐसा आएगा जब शरीर काम नहीं करेगा; लेकिन इस वक्त रुक जाए तो मैं कुछ कर सकता हूं। मैंने बहुत प्रयास किया, पर किसी न किसी तरीके से ऊर्जा निकल ही जाती थी।
“मुझे जांच लो”
फिर हम कहे, आप कुछ भी बोलो, मैं करने के लिए तैयार हूं। बोले, जन्म-जन्म लगते हैं। मैंने कहा, तो इस जन्म में दीक्षा देने की क्या जरूरत थी? या तो आप बता दो कितने जन्म बाकी हैं; मुझे तो इसी जन्म में यह चाहिए, और कुछ नहीं चाहिए। आप मुझे जांच भी सकते हो — आप गुरु हो, मैं शिष्य हूं; जहां उतारना है उतारो, मैं पीछे हट जाऊं तो बोलना।
एक बार कंठी गिर गई तो मैंने नहीं पहनी। उन्होंने कहा, पहन लो। मैंने कहा, पहनने से क्या होता है? फिर मैंने अपने गुरु जी से यही कहा कि मैं जिज्ञासु हूं, खोजी हूं, भटका हुआ हूं, मेरे अंदर हर कमी है — तभी तो आपके पास आया; मैं भगवान को खोज लूंगा, यह पक्का है, और इसी जन्म में खोजूंगा। उन्होंने कहा, जो तुझे चाहिए, वह तुझे सतगुरु दे सकता है, मैं नहीं।
इसी प्रसंग का छोटा रूप: JY-0002 (0HCUd_HZSA4); अब जाऊं कहां (UQeAF5eyqPs) में भी