JY-0007 · खोज
बद्रीनाथ के अनाम महात्मा — जो बस के पीछे दौड़े
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 1:05:22 से
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मुख्य बातें
- पैरों से खून टपक रहा था; एक बुजुर्ग महात्मा ने गर्म कुंड में पांव धुलवाए और बिना पैसे दर्शन कराए।
- उन्होंने कॉपी खोलकर कहा — जितना पैसा चाहिए ले लो; उसी क्षण पैसे का अहम भाव खत्म हो गया।
- नाम नहीं बताया; बस चली तो उसके पीछे दौड़े — “जीवन की यह घटना अद्भुत है।”
दर्शन
फिर बद्रीनाथ गया — बद्रीनाथ की घटना बहुत अजीब है। गाड़ी पकड़ी; गाड़ी वाले ने बाद में मुझसे पैसा लेने से मना कर दिया। फिर पता पूछकर गया कि बद्रीनाथ का गेट कहां है। आंखों से आंसू आ रहे थे, क्योंकि पैरों से टप-टप खून गिरता था। मैं बोला, हे बद्रीनाथ, कहां हो, यह तो बताओ।
आगे मुझे एक महात्मा मिल गए। बोले, चलो। गर्म पानी के कुंड में पांव धुलवाए; मेरी चप्पल उठाने लगे तो मैंने कहा, महाराज जी, आप मत छुइए — वे बुजुर्ग थे, मेरी उम्र कम थी। एक मंदिर में पुजारी ने रोका कि बाहर से दर्शन करो, तो उन्होंने उसे डांटा और मुझे अंदर से दर्शन करवाया। बद्रीनाथ के अंदर के दर्शन के लिए 1500-2000 लगते थे, मैंने कहा इतना लगता है तो नहीं करना — वे मुझे लाइन में खड़ा करके बिना पैसे अंदर ले गए, चंदन का लेप दिया। मैंने कहा, मैं एक ही कपड़ा पहनता हूं, कहां रखूं — तो मैं उसे खा गया, कि जीवन भर के लिए रख लिया।
“जितना पैसा चाहिए ले लो”
होटल में वे सबसे कहते, महाराज जी केदारनाथ-बद्रीनाथ से पैदल आए हैं, इन्हें बढ़िया भोजन दो। मैं कहता, केदारनाथ पैदल चढ़ा था पर बद्रीनाथ गाड़ी से आया हूं — लेकिन वे मेरे पांव देखकर यही बोलते। खुद भोजन नहीं किया और चले गए। सुबह बद्रीनाथ के सामने हाथ जोड़ रहा था तो पीछे खड़े थे — बोले, कब से ढूंढ रहा हूं; मेरे लिए साबुन-तेल लाए थे। फिर लक्ष्मी मां के दर्शन कराए, भीड़ हटवाते रहे।
फिर अपनी कुटिया में ले गए, बिस्किट खिलाए, और एक कॉपी खोली — खोलते ही बोले, जितना पैसा चाहिए ले लो। जैसे ही उस पैसे को मैंने देखा, मेरा पैसे का जो अहम भाव था, वो वहीं से खत्म हो गया। मैंने कहा, महाराज जी, कुछ भी नहीं चाहिए, और मैंने उन्हें कुछ पैसे दिए।
बस के पीछे
रात को वे मेरे लिए बस का समय देखने गए थे। नाम-पता पूछा तो बोले, यह सब मुझे पसंद नहीं। बस स्टैंड पर चाय-टोस्ट खिलाया, मुझे बस में बिठाया। गाड़ी स्टार्ट होने लगी तो खिड़की से बोले, तुम बहुत अच्छे महात्मा हो — यह मुझे सुबह पता चला, रात को पता चलता तो तुम्हें कुटिया में रोकता। मैंने उनका हाथ अपने सिर पर रखवाया।
बस चल दी, पीछे नजर गई तो देखा, वे बस के पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। जिंदगी में ऐसा हुआ नहीं था कि कोई मेरे लिए बस के पीछे दौड़े। मुझे कहीं जाना भी नहीं था, फिर भी मैं उतर नहीं पाया, और पूरे पहाड़ों में उन्हें ढूंढता रहा। आज तक मैं बद्रीनाथ जा भी नहीं पाया। केदारनाथ में बाढ़ आई थी, उसके एक साल बाद की यह घटना है। उन्होंने नाम नहीं बताया — वे अद्भुत थे; जीवन की यह घटना बहुत अजीब है, अद्भुत है।