JY-0008 · खोज
ओंकारेश्वर की ठंडी रात — “लगेज नहीं तो कमरा नहीं”
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 27:25 से
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मुख्य बातें
- खोज में लालच भी आता है, जरूरत भी — शरीर को बिस्तर भी चाहिए।
- सर्दी में एक ही फटे वस्त्र में नर्मदा तट पर कांपते रहे; होटल ने बिना सामान के कमरा नहीं दिया।
- “वो रात मुझे अभी भी याद है — अपने आप को समझना इतना आसान नहीं।”
नर्मदा तट पर
खोज में लालच भी आती है, जरूरत भी, भूख भी है — शरीर को बिस्तर भी चाहिए। एक बार ओंकारेश्वर में गया। नर्मदा तट पर नीचे बैठा था — इस पार ओंकारेश्वर, उस तरफ ममलेश्वर। ठंड का महीना, शरीर कांप रहा था, और मैं एक ही वस्त्र में रहता था, कोई संसाधन रखता नहीं था। कपड़े फट जाते थे — दो-दो, तीन-तीन साल ऐसे ही हो जाता था।
शरीर ठंड से इतना तड़प रहा था कि समझ नहीं आ रहा था कहां जाऊं। ऊपर गणपति मंदिर में जाकर सोया, पर डर था कि सुबह चार बजे कोई हटाएगा, तो चार के पहले भाग लेना। उस रात नींद नहीं आई। रात को होटल के पास गया, बोला मुझे कमरा दे दो — पैसे मेरे पास थे, आईडी भी थी। बोले, लगेज? लगेज तो मेरे पास नहीं है। तो कमरा नहीं मिलेगा। उसने कमरा नहीं दिया।
उस रात तड़पते हुए एक-एक मिनट भारी पड़ा। वो रात मुझे अभी भी याद है — ऐसी कई रातें याद हैं। अपने स्वयं को समझना इतना आसान नहीं है जितना हम समझते हैं; बहुत कठिन राह है।