JY-0006 · खोज
सड़े पांव, वाराणसी और केदारनाथ की पैदल चढ़ाई
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 1:00:22 से
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मुख्य बातें
- गांव में नवरात्रि में तीन अखंड ज्योति संभालते-संभालते पांव सड़ गए; फिर भी दवा न लगाने का संकल्प था।
- वाराणसी में बिना एड्रेस-प्रूफ कमरा नहीं मिला; एक ऑटो वाले ने अपने घर रखा।
- केदारनाथ की चढ़ाई में अंधेरा और जंगली जानवरों का डर — “आज रुका तो डर मुझे हरा देगा।”
तीन अखंड ज्योति
एक बार की घटना है — मैं गांव में साधना कर रहा था। मैंने तीन अखंड ज्योति जलाई थीं — एक माता दुर्गा को, एक शिव जी को और एक हनुमान जी को। उस अखंड दीये को संभालने में, पानी में पांव धोते-धोते मेरे पांव सड़ गए, इतने फूल गए। नवरात्रि की, फिर वहां से निकला — मुझे केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री की यात्रा करनी थी।
वाराणसी का ऑटो वाला
फिर मैं वाराणसी आया। बस से धीरे-धीरे उतरा तो आंखों में आंसू थे — उस समय मेरा हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं था और मैं खड़ा होने लायक नहीं था। रोते-रोते रोड क्रॉस की, एक ऑटो रोका। टिकट नहीं हो पाया था, तो कहा होटल ले चलो। होटल वाले ने कहा, आधार कार्ड बिना कमरा नहीं मिलेगा — उस समय मेरा आधार नहीं बना था, पैन कार्ड में एड्रेस-प्रूफ नहीं होता। कमरा नहीं मिला।
ऑटो वाले ने कहा, महाराज जी, आप मेरे घर चलो। उसके घर एक दिन रुका, टिकट कराया। मैंने उसे कुछ पैसा दिया — वह नहीं भी ले रहा था; मैंने कहा, कहीं भी रुकता तो देता ना, तुमने मुझे सहारा दिया। फिर हरिद्वार के लिए निकल गया।
मौत के आगे दर्द गया
जब केदारनाथ की यात्रा के लिए गया तो मुझसे चला नहीं जा रहा था। सुबह चप्पल पहनने में बहुत समय लगता, आंखों से आंसू; सोते समय पैर की चमड़ी निकालनी पड़ती थी। लेकिन मैंने संकल्प लिया था कि मेरे पांव भी कट जाएंगे, पर मैं दवा नहीं लगाऊंगा, क्योंकि यह मेरी आखिरी यात्रा चल रही है।
ऊपर चढ़ते हुए कुछ लड़के मिले, परिचय हुआ, बोले साथ चलेंगे — फिर वे सब आगे चले गए और मैं रात को फंस गया। दो किलोमीटर ऊपर एकदम अंधेरा, और वहां जंगल में शेर, भालू खुले घूमते हैं। एक आदमी ने कहा, मेरे गांव में रुक जाओ। मैंने कहा, नहीं — अगर आज मैं रुक गया तो डर मुझ पर हावी हो जाएगा और मुझे हरा देगा; मुझे इस हार से निकलना है। मरना तो है ही।
मैं पैदल चल दिया। और मैं आपको बता रहा हूं — जब मौत सामने आती है, तो उसके आगे पैर का दर्द कम हो गया। जो लंगड़ाकर, रोकर चल रहा था, उसकी चाल एकदम तेज हो गई; दर्द गया, आंसू गए, और पहुंच गया। लोगों ने कहा, महाराज जी, आप इतनी रात को कैसे पहुंच गए?
वे लड़के मेरे कमरे पर एक पत्र दे गए थे। मैं उनके पते पर गया और रोते हुए कहा — जिंदगी में कभी किसी के साथ ऐसा मत करना। तुमने मुझे आश्वासन दिया, आज मुझे कुछ हो जाता तो जिम्मेदार कौन होता? भरोसा देना तो उसे पूरा करना, नहीं तो भरोसा देना मत।