JY-0009 · खोज
फटे कपड़े, वेटिंग रूम और चुपचाप सहे अपमान
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 33:03 से
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मुख्य बातें
- दिल्ली में ट्रेन लेट थी — फटे कपड़े देखकर वेटिंग रूम में जाने से रोका; टिकट दिखाया तो सॉरी।
- फटे कपड़ों ने समाज को समझने का बड़ा मौका दिया — लोग धक्का देते, गाली देते, सोचते नहीं थे।
- प्रतिवाद नहीं किया, समय और ऊर्जा बचाई — आज वे घटनाएं हंसी दिलाती हैं, किसी के लिए मलाल नहीं।
आवरण की पकड़
मैंने देखा कि लोग आवरण पर कितनी पकड़ बनाए हुए हैं। एक बार माता वैष्णो देवी गया था, वापस आ रहा था, ट्रेन लेट थी। दिल्ली में वेटिंग रूम में गया तो बोले, आप नहीं जा सकते। मैंने कहा, क्यों नहीं जा सकता? अंदर भी आदमी ही बैठे हैं, मैं भी इंसान हूं। मैंने कहा, टिकट है। तो बोले, पहले बताना था। मैंने कहा, आपने पूछा कहां? टिकट दिखाने के बाद सॉरी बोलते हैं — आप कपड़े को क्यों देख रहे हो? यहां टिकट से आते हैं, कपड़े से नहीं।
फटे कपड़ों ने मुझे समझने के लिए बड़ा मौका दिया — समाज को भी और मुझे भी। लोग खुलकर मुझसे बात करते थे; धक्का मारना होता तो सोचते नहीं थे, गाली देना होता तो सोचते नहीं थे। जीवन के अनेक अनुभव रहे — 12 साल कम नहीं होते।
गाली का मलाल
आज उन्हीं घटनाओं से हंसी आ रही है, लेकिन तब वे आंसुओं में थीं। कोई गाली देता था तो कई दिन उस गाली को झेलता रहता था, क्योंकि हम जवाब नहीं दे पाते थे — हमें निकलना था। उनसे लड़ते तो समय देना पड़ता; प्रतिवाद नहीं करना, समय और ऊर्जा का बचाव किया। लेकिन मलाल इतनी जल्दी जाता नहीं था — कई दिन, कई महीने अंदर रहता था। आज वे सब घटनाएं हंसी दिलाती हैं, और किसी के लिए मलाल भी अब नहीं है।