JY-0022 · खोज
हवन का धुआं, सवा लाख जप — “मुझे बस पहुंचना था”
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 2:10:31 से
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मुख्य बातें
- निकलने के बाद से आज तक सोना-उठना, कहां जाना — कुछ तय नहीं; रात-दिन नहीं देखा।
- दो-दो हवन करते, दरवाजे-खिड़की बंद; महीनों धुएं में सोए, फेफड़े जाम हो गए।
- श्मशान, पेड़, पत्थर, पागलों से बात — “कहां है, कहां नहीं, यह फैसला मैं कैसे करूं?”
समय के पार
मैं घंटों में नहीं गया, आज भी नहीं हूं। जब से मैं निकला हूं, मेरा सोना, उठना, बैठना, कहां जाऊंगा, किससे बात करूंगा — यह निर्णय आज तक मैंने नहीं किया। मैंने रात-दिन देखा नहीं; मुझे रात 12 बजे जाना है तो चल दिया। सुबह लोगों के लिए आती है — मैं कब सोता हूं, कब जागता हूं, कब खाता हूं, बता नहीं सकता।
हवन और जप
उस स्थिति के पहले बस इतना था कि ईमानदारी से चलना है। साकार रूप में अनुष्ठान बहुत किए, हवन बहुत किए, मंत्रों का जाप सवा-सवा लाख किया — खूब पागल हो गया था। एक नहीं, दो-दो हवन करता था, दरवाजे बंद, पूरी खिड़की बंद, और उसी धुएं में सोता था। कई महीनों तक थूक में काला-काला निकलता था, फेफड़े जाम हो गए थे — मैं उस धुएं को भी बाहर नहीं जाने देता था, जिस धुएं से लोगों को घुटन होती है। सुबह उठता तो पूरी जमीन काली हो जाती थी।
मुझे जीना-मरना नहीं था, मुझे पहुंचना था। पागलों से बात, हवन, पूजा-पाठ, श्मशान जाना हो तो श्मशान, पेड़ के पास, पत्थर के पास — मुझे पता था वह कहीं भी है, तो मैं कैसे फैसला करूं कि यहां है और यहां नहीं? मैंने कभी फैसला नहीं किया, बस जाता चला गया।