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ज्योतिष के पुराने यजमान का पैसा — “आज लालच को मार दिया”
2 सितंबर 2025 · ऐसा क्या करूं, जो तेरी सेवा हो पाए? · 42:25 से
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मुख्य बातें
- मुंबई में ज्योतिष के कारण बहुत लोग जुड़े थे; एक दिन पैसे की जरूरत हुई तो एक पुराने यजमान को फोन किया।
- उनका काम करा दिया, पर जब वे पैसा देने लगे तो नहीं लिया — जबकि गए उसी के लिए थे।
- “आंखों में आंसू थे, अंदर हंसी थी — आज मैं जीत गया, लालच हार गया।”
घटना
लालच मेरे अंदर पैदा होती थी, मैं उसको मार देता था। हमारे पास मुंबई में काफी लोग जुड़े थे, क्योंकि मैं पहले ज्योतिषी था, बहुत सारा काम करता था। एक दिन मुझे पैसे की जरूरत हुई। एक सज्जन जब भी मिलते थे, कुछ न कुछ दे ही देते थे — वे भी अपनी जरूरत में देते थे; लाभ न दिखे तो कोई किसी को नहीं देता।
हमने फोन किया — वे वसई में थे, मैं नालासोपारा में। वे भी बहुत दिन से पीछे पड़े थे कि मेरे लिए कुछ करो। मैंने कहा, आज कर ही देते हैं। मिले, हमने काम करा दिया, उन्होंने होटल में नाश्ता कराया, और जब मैं जाने लगा तो पैसा देने लगे। गया तो मैं उसी के लिए था। मैंने कहा, भाई, आज मैं नहीं लूंगा। बोले, लीजिए-लीजिए। बोला, नहीं लूंगा तो नहीं लूंगा — और आगे बढ़ गया।
आंसू और हंसी
मेरी आंखों में आंसू थे और मैं निकल गया — मैंने लालच को मार दिया; वहां मैं जीत गया, लालच हार गया। आंसू जरूरत के थे, लेकिन मेरी असली जरूरत लालच से मुक्त होना था। एक तरफ आंसू, एक तरफ हंसी — आज भी वह बात कहते हुए दोनों हैं।