JY-0030 · उपलब्धि
नर्मदा तट पर अंतिम खोज — “भोजन तो कुत्ते को भी मिलता है”
16 फरवरी 2025 · अब जाऊं कहां · 13:17 से
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मुख्य बातें
- रावेरखेड़ी लौटे; एक ब्रह्मचारी ने कहा, नर्मदा तट पर रहो, खाओ-पियो — “भोजन के लिए निकला हूं तो मुझमें और कुत्ते में क्या फर्क?”
- एक गिलास दूध पर साधना का संकल्प; फिर एक बंगाली बाबा के साथ — “जो वे कहते, करता; फिर पूछता, इससे क्या होगा?”
- “पानी में हाथ डालो तो तुरंत भीगता है” — कोई भी साधना हो, असर तुरंत होगा या कभी नहीं।
ब्रह्मचारी को उत्तर
फिर मैं मुंबई चला गया, पर मुझसे रहा नहीं गया, और मैं उसी जगह रावेरखेड़ी में वापस आया जहां महाराज जी मिले थे। मैं एक पेड़ के नीचे बैठा था, एक ब्रह्मचारी आया, बोला — नर्मदा तट पर रहो, खाओ-पियो, कोई कमी नहीं होगी। मैंने कहा, सुनिए, वह तो एक कुत्ते को भी मिलता है। अगर मैं भोजन के लिए निकला हूं, तो मुझमें और आवारा कुत्ते में क्या फर्क है? हम भोजन के लिए नहीं, कुछ खोज में निकले हैं। फिर वह चला गया।
मुंबई से जब वहां आया, तो मैंने कहा, अब एक गिलास दूध पर यहीं साधना करूंगा। वहीं कुटिया बनाकर रहने का भाव था।
बंगाली बाबा के साथ
फिर वहां दो लोग और मिल गए — एक बंगाली बाबा थे। बोले, मैं तुम्हें बताऊंगा नहीं, दिखाऊंगा; आज तक मैं अमरकंटक से इतने समय से घूम रहा हूं, कोई मुझसे पूछा नहीं, आप पहले आदमी हो जो आध्यात्म की बात कर रहे हो। मैं चल दिया, और वह व्रत भी वहां छूट गया।
वे बताते गए, हम करते गए। फिर पूछ लेते थे, यह किया, इससे क्या होगा, वह तो बताओ। क्योंकि मुझे मालूम है — अगर मैं पानी में हाथ डालूंगा तो तुरंत भीगेगा; अगर तुरंत नहीं भीगा तो या तो हाथ डाला नहीं, या पानी नहीं है। कोई भी साधना काम करेगी तो उसका असर तुरंत होगा — यह मेरे जीवन का अनुभव है। बारिश का इंतजार क्यों करूं? पता नहीं बारिश तक मैं रहूं या न रहूं। मैं इस भाव से खोज करता था।
भंदा गांव
आखिर में आते-आते भोइरा गांव, भंदा गांव में काफी दिन रहे, रात को एक-दो बजे तक बातें होतीं। गांव के लोग कहने लगे, आपको ज्ञान हो गया। मैंने कहा, नहीं, मेरा आखिरी समय चल रहा है, लेकिन ज्ञान मुझे नहीं हुआ है, मुझे मालूम है। फिर एक तारीख को लोग मुझे नदी पार पुल तक छोड़ने गए। आगे जाते-जाते उन बाबा की तरफ से भी मना हो गया। मेरी जेब में एक पैसा नहीं था; जाते वक्त वे पैसा देने लगे तो मैंने कहा, मैं आपसे पैसे के लिए नहीं मिला था, ज्ञान के लिए मिला था। फिर वहां से निकला और रो रहा था — कहां जाऊं, अब तो सब खत्म हो गया।
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