आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रवचन PV01-0006 · भाग 1

दर्शन से कुछ नहीं होगा — कर्म अपनाओ, और उसके जैसे बनो

4 जनवरी 2026 · रविवार प्रश्नोत्तरी 4 जनवरी 2026 #योगी

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

मुख्य बातें

दर्शन से कुछ नहीं होगा — मूल आपका कर्म है

जब भोग-विलास से खूब मन भर जाए, तब सत्संग में बैठा करो, कि कहीं अब जाना नहीं है। एक तो जंगल में आके बैठे कि शांति से सत्संग होगा; यहां भी पीछा नहीं छोड़ रहे हैं — दर्शन के लिए चले आते हैं। अरे, हम कहें भाई, दर्शन के लिए कतई मत आओ। क्या होगा? राम से, कृष्ण से कितने लोगों ने दर्शन किया — क्या कर लिया? रावण ने भी राम का दर्शन किया, क्या कर लिया? क्या मुक्त हो गया? पापी बन के गया।

अरे भाई, मूल कर्म है आपका। दर्शन करने वाले के बताए हुए मार्ग पर जब चलोगे, तब लाभ है। क्योंकि वह दर्शन के लायक कब बना? ऐसे थोड़ी ना बना। दर्शन के लायक तब वो बना, जब उसके द्वारा कर्म हो रहा है। ठीक है? तो जब उसका कर्म अपनाओगे, तब दर्शन का मतलब है।

राम थे, कृष्ण थे — लोगों ने उस समय दर्शन करके क्या किया? कृष्ण के द्वारा एक का कल्याण हुआ — वो अर्जुन, जो कर्म के सिद्धांत को समझे। दर्शन से क्या हो जाएगा? महात्मा बुद्ध आए, क्या हो गया? उनके पिता ने दर्शन किया, फिर भी तड़प-तड़प के उनके सामने ही मर रहे थे। राम के पिता उनके सामने ही, पुत्र के वियोग में, तड़प-तड़प के मर गए। भाई, इतने महापुरुष आए; अगर दर्शन से कुछ होता तो उस समय सबका कल्याण हो जाता।

संत रविदास आए, कितने — रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद — दर्शन से कुछ थोड़ी ना होगा। मूल आपका कर्म है। और आप जिसका भी दर्शन करना चाहते हो, उसके कर्म से करना चाहते हो, तो उसका कर्म अपनाओ ना।

मैं प्रत्यक्ष में जीता हूं — बताए हुए मार्ग में जियो

दर्शन से देखो कुछ नहीं होने वाला। मैं प्रत्यक्ष में जीता हूं। जिसका दर्शन आप कर रहे हो, जब उसके बताए हुए मार्ग को अपना रहे हो, बताए हुए शब्दों में जी रहे हो, तब कुछ होगा।

क्योंकि अगर उसका दर्शन करने की जिज्ञासा आपकी जगी, इच्छा जगी, इसका मतलब उसके द्वारा कोई कार्य हुआ है। तो जब उसके साथ रहोगे, जियोगे, समय दोगे, तब जाके कुछ हो सकता है।

अपने लिए समय दो — बैठ जाओ तो बैठ जाओ

कभी भी जब आप अपने आत्मिक कल्याण के लिए जाओ, तो अकेले जाओ, वीरों की तरह; नहीं तो साथ वाला तुम्हें खींच लेगा।

एक दिन, दो दिन अपने लिए नहीं दे सकते? क्या करोगे जाके? कुछ धन कमा लोगे, और क्या करोगे? तुम्हारे जाने से क्या हो जाएगा? अभी शरीर छूट जाए तो क्या हो जाएगा — तुम्हारा घर नहीं चलेगा? ऐसा नहीं है। अपने लिए समय नहीं देंगे, भोग-विलास में पूरी जिंदगी खपा देंगे; लेकिन एक दिन सत्संग में बैठना हो तो — नहीं समय है, मेरे पास टाइम नहीं है।

एक शिक्षक पढ़ा रहा है, और उसमें से कोई बोले मैं बाथरूम करके आता हूं, कोई बोले मैं बाहर जाता हूं, कोई बोले मेरी मां बीमार — तो शिक्षक क्या पढ़ाएगा? तो मेरा कहना है कि भक्ति में, प्रेम में, सत्संग में बैठ जाओ तो बैठ जाओ — डूब जाओ, कि अब कहीं नहीं जाना है।

जब दो-चार दिन रहोगे, उसके बाद जाके कुछ आत्मिक चिंतन होगा। क्योंकि यादें कब सताएंगी? मोह-आसक्ति कहां-कहां है, कब दिखेगी? जब आप कुछ दिन उनसे अलग रहोगे।

एक सड़ी मछली — सत्संग का लय

जैसे एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है, वैसे ही अगर जिज्ञासु के नाम पर एक भी टाइम-पास वाला बैठ गया, तो सत्संग नहीं हो पाता। जब एक ही मार्ग के मार्गी बैठते हैं, तब जाके लय बनता है।

आत्मज्ञानी अपने जैसा ढूंढता है

रामकृष्ण परमहंस ने एक उदाहरण दिया है कि जैसे किसी कन्या का विवाह हो जाए। फिर वह जब ससुराल से मायके आती है, तो अपनी सहेलियों को खोजती है। अपने भाई से भी मतलब नहीं, बाप से भी मतलब नहीं, मां से भी मतलब नहीं — अपनी सहेलियों को खोजती है, और सहेलियों को बैठा के ससुराल की जितनी भी बातें रहती हैं, सब खोल-खोल के बताती है। सब खुश होके उसका मजा लेते हैं, हंसते हैं, प्रसन्न होते हैं। अगर एक भी अनजान कोई बैठ जाए, तो वह नहीं बता पाएगी।

ऐसे ही कोई अपने आप को उस स्थिति में पहुंचाया है, और वहां बहुत कुछ है; लेकिन वो तभी बताएगा जब उसके जैसा कोई मिले। जब कोई अपने आप को उस स्थिति में पहुंचाता है, तो अपने जैसा ढूंढता है — कि कोई मुझे मिले और मैं उसे बता सकूं कि मैं यहां से यहां गया तो मेरे साथ ये-ये हुआ; तुम भी पहुंचो, तुम भी जाओगे, तुम्हारे साथ भी यह सब होगा। तो वह बताना चाहता है, लेकिन किससे बताएगा? अपने जैसा मिलेगा तब बताएगा।

अगर उन सहेलियों के बीच में कोई ऐसी बैठ जाए जिसे वो नहीं जानती, तो वो फिर खुल के नहीं बोल पाएगी — अदब हो जाएगा, मर्यादा हो जाएगी। क्यों? क्योंकि अनजान लोग उसका मजाक उड़ाएंगे, उसकी भावनाओं को समझ नहीं पाएंगे। तो वैसे ही कोई आत्मज्ञान को उपलब्ध होता है, तो वो अपने जैसा ढूंढता है — कोई इस मार्ग का मार्गी हो और मैं उसे सब बताऊं।

आत्मज्ञानी किसी से मिला है; वो ऐसे ही नहीं बताएगा, क्योंकि अगर ऐसे बताए तो आप समझ नहीं पाओगे और सिर्फ एक मजाक बनाओगे। जिस दिन उसे भरोसा हो गया, पूरा-पूरा पक्का हो गया कि तुम उसके जैसे हो, तब तुम्हें पकड़ के बताएगा, तब तुम्हें जाने भी नहीं देगा। वो किसी से मिला है — आप उसे शरीर रूप में मत देखो।

उसके जैसे हो जाओ — तब महसूस होगा

जब आप उसके जैसे हो जाएंगे ना, तो आपको बता देगा; फिर आपको पूछना भी नहीं पड़ेगा। वो कहता जाएगा, आप सुनते जाओगे, और आपके पास यही शब्द रहेगा — आगे क्या हुआ, आगे क्या हुआ? इसलिए कि आपके साथ भी एक दिन होने वाला है।

जैसे किसी का बेटा हो — जहां भी मेरा का भाव हो, उसको चोट लगी तो दर्द आपको हुआ। अगर मेरा का भाव ना हो, चोट लगे तो दर्द नहीं होगा। वैसे ही आप उसके जैसे हो, इसलिए जितना वह बता रहा है, आप भी उस आनंद में जा रहे हो, आप भी फील कर पा रहे हो। अगर आप उसके जैसे नहीं हो, तो फील ही नहीं कर पाओगे — मजाक बन जाएगा; तुम कहोगे, ऐसा भी होता है क्या?

जैसे तेल में तेल मिला तो दो से एक हो गए; अलग-अलग पानी को मिला दो — दो हैं, लेकिन मिल गए, एक दूसरे में समा गए। तो जैसा वह है, अगर वैसा कोई मिल जाएगा, तो फिर दो खत्म, दोनों एक ही हो गए। अगर वो कुछ बता रहा है, तो वो फील कर पाएगा — भले वो नहीं पहुंचा है, उसे महसूस होने लगेगा।

इसलिए मैं कहता हूं कि भैया, ना दर्शन के लिए आओ; अगर आप एकदम जिज्ञासु हो, तब आओ, तब कोई मतलब है। मैं जितनी भी मेहनत कर रहा हूं, मेरे जैसे लोगों के लिए कर रहा हूं।