आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रवचन PV01-0007 · भाग 1

दोष देखने वाला दोषी — सबको नहीं, अपने आप को साधो

1 जुलाई 2026 · ध्यान में ध्यान कैसे करें ?

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मुख्य बातें

परीक्षा आएगी — कर्ता का भाव नहीं होना चाहिए

जैसे ही आप करते-करते एक समय ऐसा आएगा कि आप एकदम पवित्रता की तरफ पूरी तरह बढ़ रहे हो, समर्पित हो गए हो, समर्पण कर दिए — उसी समय वह परीक्षा लेने आ जाएगा। उसी समय जांच होगी कि प्रभाव काम कर रहा है या नहीं कर रहा।

यह ध्यान रखना — कर्ता का भाव नहीं होना चाहिए कि मेरे द्वारा हो रहा है। क्योंकि पहले मैं नहीं था और बाद में नहीं रहूंगा, तो भी इस दुनिया में हो ही रहा था। मुझे तो छूटने का मौका मिला कि मैं इस जगत से कैसे छूट जाऊं, इस भवसागर को कैसे पार करूं। तो कैसे भी अपने आप को छुड़ा — चाहे सेवक बन के, चाहे साधक बन के।

इस भवसागर को पार करने वाले दो ही होते हैं — एक साधक, एक सेवक। उससे मिलना है तो सेवक या साधक, दो में से एक बन। और दोनों बनना इतना आसान नहीं है, कि साधक बन के फिर आदमी में 'हम' आ जाता है, तो लोगों के लिए अपने 'मैं' को खड़ा कर लेता है — कि देख, तू अलग है, मैं अलग हूं। अलगाव को मिटाने के लिए साधना किए थे, कि अलगाव को और पैदा करने के लिए?

भेद समझना ही भेद है — दोष देखने वाला दोषी

इस भेद को मिटाना है कि हम में तुम में क्या भेद है। भेद समझना ही तो भेद है। सब एक ही से हैं, तो कैसा भेद? कैसे भी इस भेद को खत्म करो। यहां समभाव, समदृष्टि, एक भाव आ गया, तो फिर एक से मिलना हो जाएगा। एक से मिलने के लिए एक भाव पैदा करना पड़ेगा।

सब एक ही से हैं, सब एक जैसे हैं, और सब अपने-अपने कर्मों का प्रारब्ध काट रहे हैं। किसका दोष दें? किसको दोषी ठहराएं? और दोष देखने वाला दोषी — यह आखिरी शब्द है। जब तक आपको दोष दिख रहा है, तब तक आप भटक रहे हैं। कैसे भी अपने आप को दोष देखने से छुड़ा लो। दोष हटाने वाला महान है — जो भी कमी दिख रहा है, उसके लिए काम करो।

उसका जगत है; उसमें हम क्या योगदान करके जाएंगे? इसलिए अपने आप को सत्कर्म में लगा। ना किसी को प्रभाव दो, ना तो किसी का प्रभाव लो। आवरण का जो प्रभाव है, उससे हटा दो — क्योंकि आवरण भी तुमसे है। तुम नहीं तो फिर आवरण का क्या प्रभाव? आवरण को प्रभाव देने वाले आप ही हो।

निर्णय करने वाला कितना श्रेष्ठ है

प्रभाव तो आपका है ना, जो सब निर्णय कर रहा है — क्या अच्छा, क्या बुरा, क्या कमी है, क्या बड़ा, क्या छोटा; यह भगवान है, यह इंसान है, यह जानवर है। सोचिए जरा, निर्णय करने वाला कितना श्रेष्ठ है कि सबका निर्णय करता जा रहा है! उस श्रेष्ठ तक पहुंच जाओ।

चाहे निर्णय करते-करते निर्णयकर्ता को हटा दो, चाहे निर्णय इतना करो कि निर्णय करने के लिए आगे कुछ भी ना रहे — तब भी आप पहुंच जाओगे। या तो निर्णय करने वाले को हटा दो। बस साध लो अपने आप को।

इसी पल में साधो — सबके द्वारा एक को साधो

पता नहीं अगला पल क्या हो — इसी पल में साधो। कम से कम वीर गति को प्राप्त हो, भोग गति को प्राप्त ना हो; भोगी बन के तो ना जाए। जिस स्थिति में हम शरीर छोड़ेंगे, अगला शरीर उसी स्थिति में मिलेगा ना। इसलिए वर्तमान में साधो, समय मत गंवाओ, क्योंकि अगले पल का ठिकाना थोड़ी ना है। यह पल बोल रहा हूं — अगला पल मुंह से कुछ निकलेगा कि नहीं, पता नहीं।

अभी तक सबको साध रहे थे; अब एक काम करो — सबके द्वारा एक को साधो। अब सबको साधना बंद करो, अपने आप को साधो, और कैसे भी अपना आत्मिक कल्याण करो।

सबको साधना बंद करो, क्योंकि सबकी गिनती है — कितने को साधोगे? और जिनको साध रहे हो, वे बदल रहे हैं; साधने वाला भी बदल रहा है; जिस शरीर से साध रहे हो, यह भी बदल रहा है। बस देखने वाला नहीं बदलता। एक को साध लोगे, तो एक तक पहुंच जाओगे; और सबको साधोगे, तो बस भ्रम में घूमते रहोगे। सबको मत साधो, सबके द्वारा एक को साध लो — फिर यह एक, एक तक पहुंचा देगा।

अपना मिलना अपने आप से करा लो। लेकिन लोगों को छोड़ोगे तब — अपने तरीके का त्याग करो। बस तरीके में हम अटक गए; तरीके का त्याग करो।

सेवा करके मेवा में मत फंसो

आप लोग तो सेवा कर ही रहे हो। सेवक बनना भी साधारण नहीं है; आपको मिला है, आप सौभाग्यशाली हो — बस इस सौभाग्य को बनाए रखें, और सेवा करके अपने आप को निर्विकार करें।

ज्यादातर यही हो रहा है — सेवा के नाम से जैसे ही हम सेवा करने निकलते हैं, फिर मेवा में फंसते हैं। जिसको छोड़ने के लिए सेवक बना, सेवक बन के फिर उसी को अपना लिया — बुरी तरह फंस गए। अब कहां जाओगे? सेवक के नीचे कहां आओगे? वहां भी आप मेवा खाने आ गए, तो कहां जाओगे? इसलिए कैसे भी अपने आप को निकाल लो।

और यह पक्का हो सकता है — इसके लिए जन्म-जन्म नहीं लेने पड़ेंगे। भाव में ईश्वर का वास है; बस आप भाव बना लो कि पक्का मुझे निकलना है। फिर देखिए, कैसे प्रकृति आपकी मदद करती है — प्रकृति स्वयं गुरु है।

ज्ञान एक ही जगह से आता है — शब्दों की मलिनता धो लो

पूरे विश्व में पानी एक ही जगह से आता है, नल अनेक हैं। ज्ञान किसी एक का थोड़ी है — वह तो बांटने के लिए मिला है। नल को पानी पिलाने के लिए मिला है; नल खुद एक बूंद भी पानी थोड़ी पीता है। नल अनेक हैं, लेकिन पानी एक ही जगह से आता है; ज्ञान एक ही है, दो नहीं।

बस एक पानी शुद्ध है, एक अशुद्ध — अशुद्ध पानी हम लोगों ने अपनी कामनाओं में कर दिया। गटर में भी वही पानी है, कोई दूसरा नहीं; वह भी पहले शुद्ध था, हम लोगों ने उसे गंदा कर दिया। शब्दों को भी हमने मलिन कर दिया — जो शब्द राम कहने में लगते हैं, वही शब्द रावण कहने में भी लगते हैं, वही शब्द गाली देने में भी लगते हैं। तो जो शब्द अशुद्ध हैं उन्हें छोड़ दो, शुद्ध शब्दों को अपना लो, और अपनी मलिनता को धो लो।

यह आप कर सकते हो — मेरा तो अनुभव है — और जब चाहे तब; यह आप ही के ऊपर है। इसके लिए जन्म-जन्म नहीं लेना, क्योंकि वह मेरे अंदर है। आज तक लोगों ने यही बताया ना कि तेरे अंदर ही है। जो मेरे अंदर ही है, उसके लिए मैंने ही निर्णय कर लिया है कि अगले जन्म में — क्योंकि कर्ता का अधिकार दिया गया है। जैसा भाव, वैसा देव।

कुछ चाहिए में नहीं, 'कुछ नहीं चाहिए' में भाव बनाइए

हिरण्यकश्यप ने पूछा, कहां है तेरा भगवान? बोले, हर जगह सर्वव्याप्त है। क्या इस खंभे में है? बोले, हां। खंभा तोड़ा गया, भगवान निकले। अगर खंभे में भगवान होता, तो दुनिया के हर खंभे से निकलते। खंभे में नहीं था — उनके भाव में था, और वह भाव उन्होंने खंभे में प्रकट कर दिया; उनको आना पड़ा, क्योंकि पूर्ण भाव, पूर्ण समर्पण — उन्हें कुछ भी नहीं चाहिए था।

कुछ चाहिए में भाव नहीं; 'कुछ नहीं चाहिए' में भाव बनाइए उसके आने का। चाहिए में तो कामनाएं आएंगी। अगर कामनाओं के लिए परमात्मा चाहिए, तो कामनाएं मिल जाएंगी, वह नहीं आएगा। क्योंकि कामनाओं में तो वह है ही नहीं — कामनाओं में तो तुम हो, तुम्हारी कामनाएं। कामनाओं में तो आत्मा भी नहीं, जीवात्मा है। जब इन कामनाओं में तुमने अपने अस्तित्व को फंसा दिया, अपने आप को खो दिया, तो वह कहां से आए? जब तुम ही नहीं हो।

मैं पक्का हूं — कैसे भी इस भटकाव को खत्म करो

आत्मा का कहां बोध है? अभी तो शब्दों का भरोसा है। लेकिन यह तो पक्का है कि मैं हूं। हर काल में, हर स्थिति में सब बदल रहा है, लेकिन मैं दृष्टा भाव से देख रहा हूं — इसका मतलब मैं पक्का हूं। उसका अभी पक्का नहीं है, लेकिन मैं पक्का हूं, यह पता है। और मेरा जीवन अशांत है, यह भी पक्का है; मैं भटक रहा हूं, यह भी पक्का है।

कैसे भी इस भटकाव को खत्म करो — और यह आप ही कर सकते हैं, और बहुत सरल है। बस जितनी मेहनत भटकने में लगाई, उतनी भटकने से मुक्त होने में कर दीजिए। कब तक भटकाओगे अपने आप को? कब तक अशांत रखोगे अपने आप को?

जैसे आपने देखा होगा, एक कुत्ता होता है जिसके घाव हो जाते हैं, कीड़े पड़ जाते हैं — वह दो ही स्थिति में रुकता है: या तो मर जाता है, या ठीक हो जाता है; उसके पहले रुकता नहीं, घूमता रहता है। वैसे ही उससे मिलना करवा लो — कैसे नहीं आएगा? जब उससे मैं हूं, तो मेरे लिए कैसे नहीं आएगा? बस यह भाव बनाना है — सबके बाद वह नहीं, उसके बाद सब।

अपने आप में भ्रम नहीं — विकारों वाला काम बंद करो

सब में भ्रम है, अपने आप में भ्रम नहीं है। देखो, सब अपने बारे में जानते हैं, लेकिन दूसरे के बारे में अनुमान लगाना पड़ता है। अपने आप में तुम्हारे द्वारा जो जाना जाएगा, वह ब्रह्म है।

बस किसी भी तरीके से अपने आप को निर्विकार करा दो, और विकारों वाला काम मत करो। कर्म करते हुए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — अब नहीं करना है; दिखावा नहीं करना है। बस अब कर लिया, थक गया। क्योंकि यह करना पड़ता है, और ईमानदारी होती है — बस यह करना बंद कर दो। देखो, आपको अपने होने का एहसास होने लगेगा, अपने वजूद को समझने लगोगे, क्योंकि बनाया हुआ वजूद मिटने लगेगा।

बड़ा बनना, छोटा बनना, दिखावा, योग्यता से ज्यादा पाने की उम्मीद — अगर आपको चाहिए तो योग्य बन के पाओ ना। जीवन बहुत खूबसूरत है; इसको हमने बेईमानी से बदसूरत बना दिया।

हमें भी लगा था बहुत छोड़ना है; बहुत बाद में समझ में आया — छोड़ना नहीं है, जो कर रहे हो वह बंद करो। छोड़ने के लिए तुम्हारे पास है क्या? बस करना बंद कर दो — खत्म बात, खेल खत्म। सारे बंधनों को आपको काटना है, और सारे बंधनों में फंसाया भी आपने — दोनों आपने किया, क्योंकि आपको कर्ता का अधिकार दिया गया है।

जैसे पकड़ा, वैसे ही छोड़ना पड़ेगा

जैसे फंसाए हो — फंसाए कैसे हो, पहले यह समझो। जब वह समझ लोगे, तब छुड़ा लोगे। जैसे कोई चीज मैंने पकड़ी है — अब इसे कैसे छोड़ोगे? अगर यह भूल गए कि कैसे पकड़ा था, तो छोड़ नहीं पाओगे। जैसे पकड़ा था, वैसे ही छोड़ना भी पड़ेगा। तो पहले, कैसे पकड़े हो, वहां जाना पड़ेगा, तभी छुड़ा पाओगे।

सीधा-सीधा कामनाओं में फंसे हैं; बस कामनाओं को छोड़ दो। अब फंस के हमने बहुत विकार इकट्ठा किया है — उसे सत्कर्म द्वारा धो लो। और चिंतन करो, आत्मचिंतन करो, पश्चाताप करो, व्याकुलता को बढ़ाओ।

व्याकुल हो जाओ — अपने घर का पता लगाओ

नींद आ रही है, आराम से भोजन हो रहा है, टाइम से सो रहे हैं — इसका मतलब अभी अपने आप को छुड़ाना नहीं। नींद नहीं आए, चैन नहीं आए, बेचैन हो जाओ — तब लगे कि आप अपने आप को छुड़ाने की तैयारी कर रहे हो। अपने घर का पता लगाने के लिए व्याकुल हो जाओ — कहां से आया हूं, कहां जाना है।

यह तो पक्का है कि मेरा यह घर नहीं है; यह तो उपयोग के लिए मिला है। कहीं ना कहीं तो मेरा घर होगा। देखो ना, अपने घर पर जाने के लिए ट्रैफिक में फंसते हो तो कैसे व्याकुल होते हो — हॉर्न बजा-बजा के, इधर-उधर से कैसे अपने आप को घर पहुंचने के लिए निकालते हो, चाहे घर पर कोई काम हो या न हो। अभी आपने इसे फिक्स घर मान लिया है, इसलिए उस घर पर पहुंचने की बेचैनी नहीं। पहले यह पक्का करो कि यह घर फिक्स नहीं है — फिर उस घर का पता लगेगा।

आपने एक नहीं, कई घर बना लिए, कई इमारतें खड़ी कर दीं, और इन्हें ही अपना घर मान बैठे। यह तो उपयोग करना है — वह घर क्या, इस साधन को भी छोड़ के जाना है। जिंदा या मुर्दा? जिंदा गए तो अपना घर मिलेगा; मुर्दा गए तो फिर अगला पिंड मिलेगा। जिंदा जाओ, मुर्दा क्यों जा रहे हो?

आवरण का खेल — बल्ब और पंखा

मानव के अलावा जितने भी जीव हैं, उन्हें भोग-भोजन फ्री में मिलता है; इसमें तो करके मिल रहा है। अगर आपने उसी के लिए समय गंवा दिया, तो आप मानव थोड़ी ना हो।

पंखे में वही विद्युत है, बल्ब के पीछे भी वही विद्युत है। बल्ब उजाला दे रहा है, पंखा नाच रहा है — आवरण की वजह से। बल्ब की जगह पंखा लगा दो, पंखे की जगह बल्ब — तो यह उजाला देगा, वह नाचने लगेगा। सबके पीछे ऊर्जा वही है, शरीर अलग-अलग। हम मानव थोड़ी ना हैं — मानव का शरीर मिला है, जिसमें कर्ता का अधिकार है। यह परमात्मा से मिलने का शरीर है; इसी शरीर के द्वारा परम ब्रह्म से मिल सकते हो। बस आवरण का खेल है — इस आवरण से मुक्त करा लो।

आखिरी में तुम क्या हो, बताइए? आपके शरीर का नाम हटा दिया जाए और यह शरीर नहीं रहेगा, तो आखिरी में आपका परिचय क्या है? दे ही नहीं सकते। परिचय में जो कामना है मान की, उसे हटा दो। परिचय में धोखा नहीं है — परिचय में जो कामना बनाए रखना चाहते हो, उसको छोड़ दो; जो मोह है, जो आसक्ति है, उसको छोड़ दो।