आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रवचन PV01-0008 · भाग 1

अपने आप को साधो — गार्डियन पहले खुद सुधरे, बुराइयां तुरंत छोड़ो

30 जून 2026 · कैसे भी अपने आप को निर्विकार कराओ ? #योगी

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मुख्य बातें

एक ही से सब है — आप भी उस परम स्थिति पर पहुंच सकते हो

कहां-कहां उलझा हूं, कैसे मेरा जीवन अच्छा होगा — यह देखो। क्योंकि एक ही ब्रह्म से सब है, तो मैं भी उस परम स्थिति पर पहुंच सकता हूं; मेरी भी क्षमता है, क्योंकि एक ही से सब है।

कोई अगर शिक्षक पढ़ा रहा है तो वो भी कभी किसी का विद्यार्थी था, और अब जो विद्यार्थी पढ़ रहे हैं वो भी कभी शिक्षक बनेंगे। कोई महापुरुष हुआ तो इसका मतलब वह भी पहले ऐसे अज्ञानता में भटक रहा था; पहुंचने के बाद वह महापुरुष हुआ। जैसे विद्यार्थी डिग्री लेने के बाद शिक्षक हुआ, वैसे ही आप भी पहुंच सकते हो — लेकिन आपको यात्रा करनी पड़ेगी।

अगर किसी विद्यार्थी को प्रोफेसर बनना है तो उसको उतनी यात्रा करनी पड़ेगी, पूरे सिस्टम में चलना पड़ेगा, एक-एक क्लास पास करना पड़ेगा — चाहे उसके पिता का ही स्कूल क्यों न हो, कॉलेज क्यों न हो। क्योंकि योग्यता किसी को कोई दे नहीं सकता। सीधा-सीधा — आंतरिक ईमानदारी, मेहनत, और मेरे कर्म से किसी को तकलीफ न हो, इसका विशेष ध्यान देते हुए जीवन में आगे बढ़ो और अपना आत्मिक कल्याण करो।

सबको साधना बंद करो — अंतर्मुखी में ही कल्याण

अपने आप को साधो। अभी तक दूसरों को साध रहे हो — चाहे अच्छे में, चाहे बुरे में; दो ही में तो साधते हैं, या अच्छा या बुरा, यही तो फैसला हम करते हैं। कैसे भी अपने आप को साधो, सबको साधना बंद करो।

क्योंकि मन एक ही है, दो नहीं; वो एक ही को साधेगा। बहिर्मुखी साधोगे तो अंतर्मुखी जाके नहीं साध पाएगा, और अंतर्मुखी जाएगा तो बहिर्मुखी छोड़ना पड़ेगा। अंतर्मुखी होना ही ठीक है — अंतर्मुखी में ही आपका कल्याण है, बहिर्मुखी में बस भटकाव।

बुराई बताना नहीं, बुराई निकालना महानता है

किसी के बारे में हमने फैसला दे दिया कि यह अच्छा है, यह बुरा है — क्या मिला आपको, इससे क्या मिला? अगर आपको लग रहा है यह व्यक्ति बुरा है तो इसकी बुराई निकाल दो ना, तब आपकी महानता है। बुराई बता देना कौन सी बड़ी बात है — आप बुराई बता के इसे नीचा दिखा रहे हो और अपने को खड़ा कर रहे हो। बुराई निकालने वाला काम करो, बताना छोड़ दो।

हम समझ-समझ के फंस रहे हैं

सबको सब पता है, तभी तो भटक रहे हैं। बस कामनाओं के चक्कर में आके हम जबरदस्ती अपने आप को फंसा रहे हैं। ऐसा नहीं कि हमें पता नहीं है — अगर पता नहीं होता तो भटकाव नहीं होता।

जैसे एक मंदबुद्धि कुछ भी घटना कर दे तो उसे सजा नहीं होगी, सुधार घर भेजा जाएगा; लेकिन एक समझदार आदमी प्रयास भी कर दे तो उसे दंड मिलेगा, क्योंकि उसके पास समझ है। तो हमारा जीवन अशांत है — इसका मतलब हमारे पास समझ है, और अशांति को हमने धारण किया है।

देखो ना, एक साल का, दो साल का बालक आपको मार भी दे, आप पर मल-मूत्र भी कर दे, तो आप कुछ बोलोगे? मुस्कुरा दोगे, अपना साफ कर लोगे, उससे यह भी नहीं बोलोगे कि तू साफ कर — क्योंकि अबोध है वो। लेकिन एक समझदार आदमी प्रयास कर दे, तो न भी हो पाए तो भी उसे दंड मिलेगा। वैसे ही हम नासमझी में नहीं, समझ-समझ के उलझ रहे हैं। किसे नहीं पता कि गुटखा खाने से, सिगरेट पीने से कैंसर होता है? लेकिन फिर भी खा रहे हैं, छोड़ ही नहीं रहे हैं।

गार्डियन होने का गलत फायदा मत उठाओ

बोलते भी हैं कि हम अपने परिवार से प्रेम करते हैं — बीवी कह रही है मत खाओ, फिर भी खा रहे हैं। यह कौन सा प्रेम है कि एक बीवी के लिए गुटखा नहीं छोड़ सकते? गुटखे से इतना लगाव है। अगर वही हमारा बालक खाए तो बर्दाश्त करोगे? नहीं करोगे। लेकिन हम खाएंगे, क्योंकि घर के गार्डियन हैं। तो जब इंजन ही खराब हो जाएगा तो डिब्बे की क्या हालत होगी? आप उन्हें क्या देकर जा रहे हो?

क्या हम इतना भी नहीं कर सकते कि अपने परिवार के लिए, जो हमारा परिवार चाहता है, वह मैं करूं? अगर हम आपस में रह रहे हैं तो वो करना चाहिए जो एक-दूसरे को अच्छा लगे। लेकिन नहीं — तुम मत करो, हम करेंगे। क्यों करोगे? एक दबाव है; मतलब गार्डियन का गलत फायदा उठा रहे हो।

बड़ा होने का मतलब तब है जब आप सबके भाव को समझते हो — यह आपका बड़प्पन है। सबकी भावनाओं की कद्र करते हो, सबकी भावनाओं का सम्मान करते हो, तब आपकी महानता है, तब आप गार्डियन के लायक हो। और गार्डियन बनने के बाद भी आप वो काम कर रहे हो जिसकी बच्चों से उम्मीद नहीं रख रहे, तो आप पूरी तरह गलत हो।

कभी न कभी उनके जीवन में जब विपरीत परिस्थितियां आएंगी तो वे भी खाएंगे — क्योंकि आपने कहा था मैं टेंशन में खाता हूं, मैं टेंशन में पीता हूं; यह आपने बच्चों के मन में डाल दिया है। तो क्या देके जा रहे हो? उनको भक्ति देके जाओ ना — कि बेटा, जब टेंशन हो तो भक्ति में जाना, सत्संग में जाना, सत्संग का सहारा लेना।

पहले बुराइयों का त्याग — आपसे परिवार प्रेरणा लेता है

इसलिए जितनी भी बुरी चीजें हैं, पहले उनका त्याग करो, तब आप अपने आप को समझ पाओगे। अपने आप को अहमियत दो, अपने परिवार को अहमियत दो, आसपास जो लोग हमसे जुड़े हैं उनको अहमियत दो — आपको देख के लोग प्रेरणा लेते हैं।

आप वही करो जो आपके लिए उचित हो, आपके परिवार के लिए उचित हो। पूरी तरह अपने आप को सुधारो। जितनी भी गंदी चीजों का सेवन कर रहे हो, अगर आपको लग रहा है कि मेरी आने वाली पीढ़ी न करे, तो आप मत करो। जब वो आपके संकल्प को देखेगी तो वो भी नहीं करेगी, उस विपरीत परिस्थिति का सामना करेगी। तो अपने अंदर मानवता लाओ — सच में प्रेम में जियो, सच में परिवार से प्रेम करो।

आप कमा के लाते हो, आप पर सब निर्भर है — तो आप उन्हें कमजोर मत बनाओ; वो जो नहीं चाहते, मत करो। या तो सिद्ध कर दो कि जो मैं कर रहा हूं वह सही है — दबाव में नहीं, वैभवों के दबाव में नहीं, शरीर की ताकत से नहीं; समझ से, ज्ञान से सिद्ध कर दो कि यह मैं खा रहा हूं, यह मेरे लिए लाभ है, और तुम भी खाओ।

धन, तन और ज्ञान का सदुपयोग करो

यह ज्ञान, धन और शरीर आपके कर्म से मिला है। देखो ना, सब अलग-अलग वैभव वाले हैं, सबकी अलग-अलग बुद्धि है, सबके शरीर की अलग-अलग ताकत है — कोई निरोगी है, कोई रोगी है। यह हमें कर्म से मिला है। तो ऐसा कर्म करो कि कभी हमारा जन्म हो तो इससे ज्यादा मिले, कम न मिले। इसलिए धन का, तन का, ज्ञान का सदुपयोग करो, दुरुपयोग मत करो।

बहुत लोग हैं जो अध्यात्म को समझ ही नहीं पाते। दुनिया का सौभाग्यशाली व्यक्ति है जो अध्यात्म को समझता है, और दुनिया का दुर्भाग्यशाली व्यक्ति है जो समझने के बाद भी चलता नहीं — बस हम बातें करते हैं। समय मत बर्बाद करो, यात्रा पे निकल जाओ।

अध्यात्म मानसिक यात्रा है — वही खाओ जो शरीर को पोषण दे

अध्यात्म मानसिक यात्रा है। अपने काम को करते हुए, जिम्मेदारियों को निभाते हुए, कर्तव्य को निभाते हुए आप आध्यात्मिक यात्रा करो — और जो मेरे शरीर को पोषण दे, वही मुझे खाना है।

आपकी गाड़ी डीजल की है और कोई कहे उसमें पेट्रोल डाल के लाओ, तो खराब हो जाएगी; पेट्रोल की है और डीजल डालोगे तो खराब हो जाएगी। एक गाड़ी के लिए इतना परेशान हो कि इसका इंजन खराब होगा, तो आपको नहीं लगता कि आपका इंजन कहीं न कहीं खराब हो रहा है? आप उस स्वाद के चक्कर में पड़ गए हो जिसकी हमारे शरीर को कोई आवश्यकता ही नहीं है, और वो कहीं न कहीं आपकी मानसिकता को बिगाड़ रही है।

आप कैंसर हॉस्पिटल में चले जाइए — एक-एक मरीज को देखिए; ज्यादातर कारण यही है, गुटखा, तंबाकू। लेकिन यह समझने के बाद भी लोग नहीं छोड़ रहे हैं।

पांचों इंद्रियों से गंदा मत ग्रहण करो

शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — इन पांच इंद्रियों द्वारा हम सब ग्रहण करते हैं। अब आप गंदा पानी पियोगे तो क्या होगा? बीमार होगे। तो गंदे शब्द मत बोलो, गंदे शब्द मत सुनो, बुरे दृश्य मत देखो, गंदी चीज मत खाओ और गंदी चीज स्पर्श मत करो — फिर आप अध्यात्म की शुरुआत कर सकते हैं।

नहीं तो पता चला कि शब्दों को इकट्ठा कर लिया, लेकिन उसमें जी नहीं रहा हूं। पूरी तरह बुराइयों का त्याग कर दो — जो हमें भटकाए उसका क्या सेवन करना? मानव शरीर मिला है, इसका लाभ ले लो; इसका सदुपयोग कर लो, दुरुपयोग मत करो।

तुरंत फैसला लो — कल कभी आता नहीं

सुनो, लेकिन अपनाओ; नहीं तो सुन के क्या फायदा — मेरा भी समय बर्बाद हुआ, आपका भी समय बर्बाद हुआ। और पूरी तरह करो, तुरंत फैसला लो — ऐसा नहीं कि बाद में करूंगा। बाद में कभी आता नहीं, कल कभी आता नहीं; कल आते-आते काल आ जाता है, खड़ा हो जाता है और बोलता है अब चल। उस समय कहोगे नहीं, अब मैं सब छोड़ रहा हूं; बोलेगा नहीं, अब चल, अब तू दूसरी योनि में जा।

तो किसके लिए परेशान था — भोग, भोजन के लिए? तुम्हें ऐसी योनियां मिल जाएंगी कि भोग और भोजन फ्री में करो, कोई रोक-टोक नहीं, चाहे जहां रहो, भटकते रहो, कुछ भी खाओ, कुछ भी पियो, कोई नहीं बोलेगा। मानव ही एक ऐसा है जो पैदा करके खाता है; बाकी जितनी भी अन्य योनियां हैं, सबको भोग और भोजन प्राकृतिक व्यवस्था से ढूंढ के मिल जाता है। इसलिए वही खाओ जिससे आपको पोषण मिले।

और वो काम कतई मत करो जिसकी आप पीढ़ी से, बच्चे से, पत्नी से उम्मीद नहीं कर रहे हो, क्योंकि आपसे उन्हें प्रेरणा मिलती है। बड़ा वो होता है जो दूसरों से जो उम्मीद करता है, वो पहले खुद देता है। महान वो होता है जो दूसरों को महान बनाता है; महान वो नहीं होता जो खुद महान बनके बस घूमता रहता है।

इसलिए अपने आप को साधो, पूरी तरह बुराइयों को छोड़ो, खानपान पर ध्यान दो, और जब समझ में आए तुरंत अपनाओ। 'अपना लूंगा, अपना लूंगा' करते-करते समय बीतता जा रहा है और हम मृत्यु के करीब जा रहे हैं। दो ही बात होती है — या तो हम छोड़ के जाते हैं, तब तो इस जगत को पार कर गए; या तो हमारी मृत्यु आ जाती है, फिर अगला शरीर धारण करेंगे। तो स्वाद का चक्कर छोड़ो, शरीर को पोषण दो, उचित तरीके से कार्य करो, ईमानदारी से जीवन जियो।

प्रेम का मतलब — दूसरों के लिए जीना

जो परिवार से उम्मीद रखे हो, वह आप भी करो। हम गार्डियन होने का गलत फायदा उठाते हैं — बेटे से उम्मीद रख रहे हैं कि तुम यह मत करो, लेकिन मैं कर रहा हूं। मान लो आप नशा करते हो और बेटा करे, तो बर्दाश्त होगा? एक बार डांटोगे, दो बार; वो कहेगा नशा करूंगा, नहीं तो घर छोड़ के जा रहा हूं — तो विवश होकर कहना पड़ेगा अच्छा तू कर, क्योंकि मोह है। वैसे ही वो भी आपको बोल नहीं पा रहा है, क्योंकि आप बड़े हो; छोटा भाई होता तो एक-दो लाफा लगाता कि मत खा। पत्नी प्यार से मना कर रही है, लेकिन दबाव से नहीं बोल पा रही, क्योंकि उसका जीवन आपके अधीन है। तो किसी को विवश मत करो।

प्रेम का मतलब होता है दूसरों के लिए जीना — यही प्रेम है। अगर हम सच में किसी से प्रेम करते हैं तो बस वो जो चाहता है वही हम करते हैं। प्रेम का सीधा-सीधा अर्थ है मिटना — कुछ नहीं चाहिए, बस तुम लोग खुश रहो, तुम्हारी खुशी मेरी खुशी। यही प्रेम की परिभाषा है कि हम जहां भी हैं, जो लोग मुझसे जुड़े हैं, जिसमें तुम खुश उसमें मैं खुश। हां, अगर कुछ गलत है तो उसे हम हटाएंगे; ऐसा नहीं कि उनके गलत का समर्थन देंगे — हम समझदारी से एक उचित फैसला लेंगे कि क्या गलत है, क्या सही है।

तो अनुशासन खुद पे करो — ज्यादातर हम लोगों पे अनुशासन कर रहे हैं। वो चीजें खाना बंद कर दो जो उचित नहीं, और तुरंत फैसला लो; कितने कल चले गए। जीवन में क्या चाहिए? शुद्ध भोजन, तन पर ढकने के लिए कपड़ा और एक मकान — बस यही चाहिए। तो उसमें जीना चालू करो, तब आप अपने आप को समझने लगोगे। समझ-समझ के जीवन में आगे बढ़ो और अपना आत्मिक कल्याण करो।