प्रवचन PV01-0009 · भाग 1
साधना में ध्यान रखने योग्य बातें — किसी को तकलीफ न हो, निराश मत हो, अपने आप से प्रश्न करो
1 अगस्त 2024 · साधना में ध्यान रखने योग्य विशेष ज्ञान / #योगीजी_का_सत्संग #साधना #ध्यान #ज्ञान
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मुख्य बातें
- साधना में सर्वप्रथम यह ध्यान रखो कि मेरे कुछ करने से किसी को तकलीफ न हो; कठोर शब्द मत बोलो, सुन लो, अपनी रक्षा करते हुए आगे बढ़ो।
- जिस लिए निकले हो वह करो, मूल पर काम करो; साधक के गिरने का लक्षण यही है कि वह निराश होने लगता है।
- यह ऐसा मार्ग है जिसमें सब अपने को ही करना है — मार्ग कोई भी बता देगा, ग्रहण करना आपकी क्षमता है, और सामर्थ्य अभ्यास-मेहनत से बढ़ता है।
- अपने आप से प्रश्न करो — मुझसे ऐसी क्या गलती हुई कि मैं अपनी स्थिति तक नहीं पहुंच पा रहा? अपनी स्थिति में पहुंचने का सबका अधिकार है।
- करोड़ों में एक तो तुम हो ही — असहाय न हो, निराश मत हो; भीड़ को छोड़ो, तभी अपने आप को पाओगे।
- गिरे हो तो इसका मतलब कभी खड़े थे — खड़े होने की ताकत तुममें है; परमात्मा के पास भेदभाव नहीं हो सकता।
सर्वप्रथम — मेरे कुछ करने से किसी को तकलीफ न हो
साधना में विशेष ध्यान रखने वाली बातें आप लोगों को बता रहा हूं। आप कहीं भी साधना करने जाते हो, या जहां भी रहते हो, उठते हो, बैठते हो — सर्वप्रथम यह ध्यान रखो कि मेरे कुछ करने से किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए, और मेरे कुछ करने से मुझे भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए।
जैसे मेरे बगल में कोई सो रहा है और मैं कुछ चिल्लाने लगा, तो उस सोने वाले से आपको नेगेटिव ऊर्जा मिलने लगेगी — तुरंत मिलेगी, वो दे या न दे — क्योंकि आपकी वजह से उसे तकलीफ हो रही है। तो आसपास को देख के, देश-काल-परिस्थिति देख के उठना-बैठना, क्या बोलना, क्या सुनना है।
कठोर शब्द नहीं — सुन लो, अपनी रक्षा करो और आगे बढ़ो
मेरे शब्दों से किसी को तकलीफ न हो — ऐसे कठोर शब्दों का उपयोग न करो, क्योंकि मैं राग-द्वेष से निकलने के लिए आया हूं। सुन लो; अपनी रक्षा करते हुए बोलो; जवाब मत दो, क्योंकि आपको मुक्ति से मोक्ष तक पहुंचना है, आप लेनदेन से मुक्त हो रहे हो।
सुन लो — उसे खुद कभी न कभी पश्चाताप होगा। और जवाब भी दोगे तो क्या मिलने वाला है? बस अपनी रक्षा करो — आत्मरक्षा, स्वाभिमान की रक्षा करो — और आगे बढ़ो। इन सब बातों का विशेष ध्यान रखो।
मूल पर काम करो — निराश होना गिरने का लक्षण
और जिस लिए निकले हो वह करो, मूल पर काम करो। हम क्या करते हैं — मूल पर काम नहीं करते; आवेश में, जज्बात में कुछ समय तो करते हैं, फिर निराश होने लगते हैं। साधक के गिरने का लक्षण यही है कि वह निराश होने लगता है।
निराश नहीं होना, काम करना। खुद ही को तो करना है। यह ऐसा मार्ग है जिसमें सब अपने को ही करना है, और इसमें मेहनत करनी है — आपको ही करनी है, आपको ही अपने को साधना है।
मार्ग कोई भी बताएगा — ग्रहण करना आपकी क्षमता
कोई भी आपको बस मार्ग बताएगा, और आपकी क्षमता है कि आप कितना ग्रहण कर लेते हो। जैसे शिक्षक सबको साथ में पढ़ाता है, उसमें भेदभाव नहीं होता; लेकिन कोई बालक पढ़ के कुछ बन जाता है, कोई कुछ और बन जाता है — उसमें शिक्षक का कोई दोष नहीं है। आपकी कितनी सामर्थ्य है, यह आप पर है।
हां, अपने सामर्थ्य को बढ़ा सकते हो — अभ्यास करके, मेहनत करके। इसलिए अपने आप पर मेहनत करो, चिंतन करो।
अपने आप से प्रश्न करो
मैं निकला हूं तो मैं आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा हूं? क्यों ऐसा हो रहा है? इतने लोग पहुंचे, तो मैंने ऐसा क्या कर दिया कि मैं नहीं पहुंच पा रहा हूं? कौन सा ऐसा पाप मुझसे हुआ है कि मेरा मिलना मुझसे नहीं हो पा रहा है? मैं कैसे अपने आप को छुड़ाऊं? अपने आप से प्रश्न करो — क्या ऐसी गलती हुई है कि मैं अपने स्तर पर नहीं पहुंच पा रहा हूं?
मैं बाहर से तो कुछ नहीं मांग रहा हूं; और अपनी स्थिति में पहुंचने का सबका अधिकार है।
करोड़ों में एक तो तुम हो ही — निराश मत हो
लोग बोलते हैं करोड़ों में कोई एक पहुंचता है — तो करोड़ों में एक तुम भी हो, तुम अपने आप को समझो ना, क्यों नहीं समझते? करोड़ों शुक्राणु मरते हैं, अनगिनत, तब जाकर एक गर्भ में पहुंचता है और वह जन्म लेता है। कहने का मतलब, करोड़ों में एक तो तुम हो ही। असहाय न हो, निराश मत हो।
आपको हमेशा ज्यादा से ज्यादा लोग आपके आत्मविश्वास को गिराने वाले मिलेंगे — कि जन्म-जन्म लगते हैं, तुम्हें सब अभी चाहिए। तो यह इसी जन्म में क्यों नहीं? इसके लिए जन्म-जन्म क्यों लेना पड़ेगा? इसमें पूरी तरह आशा रखनी चाहिए; इसमें संशय क्या है? बाहर से अगर हम कुछ बनना चाहते तो एक बार आगे-पीछे देखते कि हमारा बैकग्राउंड है कि नहीं, मेरी योग्यता इतनी है कि नहीं; लेकिन अपने से मिलने के लिए अब कौन सी योग्यता लाएं? मनुष्य शरीर मिल गया।
भीड़ को छोड़ो, तभी अपने आप को पाओगे
तो अपने आप को ढूंढ लो इस भीड़ में। पहले भीड़ को छोड़ो — भीड़ को छोड़ोगे तभी ना अपने आप को पाओगे। भीड़ को छोड़ दिया तो अकेले तुम ही बचोगे। भीड़ तुम नहीं छोड़ पा रहे हो — कुछ भीड़ को छोड़ के आते हो तो कुछ और भीड़ पैदा करने लगते हो। यह किसी एक को व्यक्तिगत नहीं, किसी भी साधक के लिए बोला जा रहा है — जीवन में भीड़ मत बढ़ाओ, और निराश मत हो, आगे बढ़ो।
गिरे हो तो कभी खड़े भी थे
चिंतन करो, मनन करो — क्यों नहीं हो रहा, क्या बात है, क्या मैंने ऐसा किया है? अगर मैं कर सकता हूं तो छुड़ा भी सकता हूं। मैं गिर गया, तो मतलब उठने की ताकत थी — कभी न कभी जीवन में मैं खड़ा था, तभी तो मैं गिरा हूं। गिरने का अगर पता लगा लिया तो मैं कैसे उठूं, बस उसका पता लगाओ। खड़े होने की ताकत तुममें है, सौ प्रतिशत खड़े हो सकते हो।
अपने आप का साथ दो, अपने आप को साधो — हर वक्त अपने आप को समझने में लगा दो।
क्या सच में मैं पूरी तरह लगा हूं?
अपने आप से प्रश्न करो — क्यों नहीं हो रहा, मैं सब तो कर रहा हूं। और अपने आप से पूछो कि क्या सच में मैं प्रयास कर रहा हूं? सच में मेरे प्रयास में पक्की खोज है? पूरी तरह लगा हूं? यह आप ही बता सकते हो, कोई और नहीं बता सकता कि आप पूरी तरह लगे हो कि नहीं — इसका पता किसी और के पास नहीं, आप ही के पास है।
अच्छा, लगा हूं तो फिर क्यों नहीं हो रहा? क्योंकि संसार में भेदभाव हो सकता है, परमात्मा के पास तो भेदभाव नहीं हो सकता ना। लगा हूं तो हो क्यों नहीं रहा — अपने आप से प्रश्न करो।