प्रवचन PV01-0010 · भाग 1
जीवंत शब्द — ईमानदारी-सत्कर्म सुने तो बचपन से हो, फर्क तब पड़ता है जब उसमें जियो
3 सितंबर 2026 · अपनी दिव्य ऊर्जा को कैसे बढा़ए ? #yogijikasatsang #प्रत्यक्षज्ञान #साधना #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान
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मुख्य बातें
- ईमानदारी, सत्कर्म — ये शब्द नए नहीं हैं, बचपन से सुनते आए हो; घर के बच्चे भी बता देंगे, लेकिन जो उनमें जीते नहीं, उनके लिए वो मुर्दे शब्द हैं।
- मैंने इन शब्दों को जिंदा किया है, क्योंकि मैंने अपने आप को जिंदा किया है — इसलिए यहां से निकलते हैं तो हिला देते हैं।
- बताने का फर्क तब पड़ता है जब बताने वाला खुद ईमानदारी से जीता हो।
- मैं जितना कहता हूं उसमें जीता हूं — जो नियम सबके लिए है, वो मेरे लिए भी है।
- वाणी वही हो सकती है, पर जीवन के बिना वो निर्बीज है — उसमें कुछ नहीं है।
ये शब्द नए नहीं हैं
ऐसा नहीं कि ये शब्द पहले नहीं थे। ईमानदारी, सत्कर्म — पहले नहीं था क्या? बचपन से तो सुनते आए हो। जितने शब्द मैं बोल रहा हूं, आपके घर के बच्चे भी घुमा-फिरा के बता देंगे। लेकिन वो मुर्दे शब्द हैं, क्योंकि उनमें जी नहीं रहे। बात ये है — मैं आपको जीवंत शब्द दे रहा हूं।
जितने शब्द बोल रहा हूं, घुमा-फिरा के किसे नहीं पता है? शास्त्र, वेद, उपनिषद, गीता, महापुरुषों की वाणियों में भरे हुए हैं। ऐसा कुछ नहीं कि मैं अलग बोल रहा हूं; लेकिन हां, जीवंत करके आपको दे रहा हूं, क्योंकि ये जहां से निकल रहा है, वो जीवंत है।
मैंने इन शब्दों को जिंदा किया है
मैंने इन शब्दों को जिंदा किया है, क्योंकि मैंने अपने आप को जिंदा किया है। मैं जीवंत हुआ हूं। अब जितने भी शब्द निकल रहे हैं, ये जिंदा शब्द हैं — प्राण-प्रतिष्ठित।
ईमानदारी बचपन से सुन रहे हो, सत्कर्म बचपन से सुन रहे हो — तब हिलते थे? नहीं हिलते थे, क्योंकि वो सब मुर्दे थे। यहां से ईमानदारी-सत्कर्म निकलता है तो हिल जाते हो, इसलिए कि वो जिंदा है। जीवंत शब्द है, जब सुनते हो तो हिल जाते हो।
बताने का फर्क तब पड़ता है जब तुम उसमें जीते हो
कोई कहे — चल, मैं तुझे ये सब सिखा दूं, ईमानदारी तो मैं भी बता दूं। सही कह रहा है, बता सकता है; लेकिन तेरे बताने का फर्क तब पड़ेगा, जब तू ईमानदारी से जीता होगा। अगर तू उसमें जीता होता, तो सामने वाला ईमानदारी-सत्कर्म सीखने यहां तक नहीं आया होता।
मैं भी उसे यही कह रहा हूं — बेटा, ईमानदारी, सत्कर्म अपना लो। वही बात तुमने भी कही, लेकिन तुम उसमें जी नहीं रहे, इसलिए तुम्हारे पास नहीं रुका, यहां चला आया। जरा सोचो इस बात को।
मैं जितना कहता हूं उसमें जीता हूं
यहां सबको तकिया लगाने से मना है। एक अंदर की बात बताता हूं — जब मैं सोता हूं और कंबल मुड़ के तकिया जैसा आ जाए, तो मैं उसे साइड कर देता हूं। मुझे भी लगता है लगा लूं, लेकिन तुरंत आवाज आती है — सबको रोक रहा है, तू क्यों लगा रहा है? जवाब देना पड़ता है। ये साधना का हिस्सा है। तो वो मेरे बगल में कहीं पड़ा रहता है, मैं भी नहीं लगाता।
सिर्फ नियम आपके ही नहीं हैं, हम भी उसी में जीते हैं। मैं जितना कहता हूं, उसमें जीता हूं। कोई नए शब्द थोड़ी ना हैं — जीवंत शब्द हैं।
वाणी वही, पर निर्बीज
संत की वाणी जो है, वो कोई आपसे भी बढ़िया वाणी में बोल रहा है; लेकिन है वो निर्बीज — उसमें कुछ नहीं है।
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