प्रवचन PV02-0011 · भाग 2
जवानी, रूप और पद का गुरूर — प्रणाम ज्ञान को होता है, मुझे नहीं
3 सितंबर 2026 · अपनी दिव्य ऊर्जा को कैसे बढा़ए ? #yogijikasatsang #प्रत्यक्षज्ञान #साधना #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान
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मुख्य बातें
- जवानी और पद बड़े खतरनाक होते हैं — इनमें बड़ा गुरूर होता है, और ये बड़ी तेजी से जाते हैं।
- रूप-रंग और पद का गुरूर मत करो; इन्हें संभालने में लोग बड़ा पैसा खर्च करते हैं, लेकिन ये संभलेगा नहीं।
- जिसने अपने आप को जवानी में संभाल लिया, वो बुढ़ापे में अपने आप को तार देगा — पर बहुत कम लोग पद और जवानी को संभाल पाते हैं।
- पद गया तो सलामी गई — लोग पद को प्रणाम कर रहे थे, आपको नहीं; आपको भ्रम हो गया।
- प्रणाम ज्ञान को हो रहा है, मुझे नहीं — ज्ञान को हटा दो तो मुझे कोई खड़ा भी नहीं करेगा।
जवानी और पद का गुरूर
जवानी इतनी खतरनाक होती है — जवानी में कुतिया भी खूबसूरत लगती है; हम लोग बोलते भी हैं, देखो कितनी सुंदर हो रही है। ऐसे ही पद होता है, ऐसे ही ताकत होती है पद की। बड़ा गुरूर होता है, और ये जाने वाला है — जवानी भी, पद भी।
वही जवानी में मचल के चल रही है — देखो, हमें कितने लोग देख रहे हैं; वही बुढ़ापे में उसे कोई नहीं देखने वाला होगा, ऐसे पड़ी रहेगी। यह जवानी और पद का यही होता है। तो हुस्न का, अपने रूप-रंग का, पद का गुरूर मत करो — यह बड़ी तेजी से जाता है।
संभालने वाले बहुत कम
इन दो को संभालने में लोग लगे हैं, और ये जाएगा पक्का। इन दो को संभालने में बड़ा पैसा खर्च करते हैं — रूप-रंग को संभालने में तो बड़ा ज्यादा — लेकिन ये संभलेगा नहीं।
तो जवानी बड़ी पागल है, पद बड़ा पागल है। बड़ा गुरूर होता है, इसमें बड़ा मचलाव होता है; लेकिन इसे जाने में देर नहीं लगेगी। जिसने अपने आप को जवानी में संभाल लिया, वो बुढ़ापे में अपने आप को तार देगा। लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जो पद और जवानी को संभाल पाते हैं — बहुत कम लोग हैं।
पद गया तो सलामी गई
फिर रूप-रंग इधर-उधर होने पर कोई देखता भी नहीं, और वो सोचती है कोई देख ले, वो सोचता है कोई देख ले। क्योंकि पद गया तो सलामी गई। जब घर से निकलते थे — सर, सर; और आज वही आप सब्जी लाने जाते हो तो कोई बात नहीं कर रहा, क्योंकि पद गया। वो पद को प्रणाम कर रहे थे, आपको नहीं। आपको भ्रम हो गया, और उसी में फंस गए।
प्रणाम ज्ञान को हो रहा है
लोग आते हैं, जाते हैं — आपको याद आती है? मेरे लिए आया कौन था? मुझे ये बात बहुत पहले से पता है — आप लोग मुझे प्रणाम करते हो, कोई भी करे, तो मैं समझ जाता हूं कि इस ज्ञान को किया जा रहा है; और इस ज्ञान को उस परमात्मा ने दिया है, तो घुमा-फिरा के प्रणाम उसका हो रहा है। भैया, यहां किसी को प्रणाम नहीं किया जा रहा, किसी का अपमान नहीं किया जा रहा — आपके कर्म को अपमानित किया जा रहा है, आपके कर्म को प्रणाम किया जा रहा है।
तो मुझे ये अच्छी तरह समझ में आ गया कि मुझे कोई प्रणाम नहीं करता — मुझे जानता ही नहीं, तो प्रणाम क्या करेगा? अपने लिए आया था, अपने लिए गया — तो याद कैसे आए? किसके लिए आए? ज्ञान के लिए आए, अपनी समझ को बढ़ाने के लिए आए। तो हम क्यों भ्रम पालें कि लोग हमारे पास हमारे लिए आ रहे हैं?
हमारे पास एक आदमी भी नहीं आ रहा। ज्ञान को हटा दो, मेरे को कोई खड़ा भी नहीं करेगा — ऐसे कपड़ों में नहीं खड़ा करेगा। ये सच्चाई है। और ये मंचों पर बैठ के बड़े-बड़े जो अपने आप को बहुत बड़े ज्ञानी बोलते हैं — ये सच्चाई है: आप ज्ञान को प्रणाम कर रहे हो, मुझे नहीं। ये ज्ञान हटा दो तो आप मुझे खड़ा भी नहीं करोगे।