आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रवचन PV03-0021 · भाग 3

मोह मिलने से है, प्रेम में कुछ नहीं चाहिए — अपने तरीके की उम्मीद का त्याग करो

16 जून 2026 · मोह और प्रेम गलत है या सही?

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मुख्य बातें

मोह में होता क्या है

मोह पहले समझना है कि मोह में होता क्या है। जीवन में आप अगर जांचेंगे तो आप पाएंगे कि आपको उन्हीं से मोह है जिससे आपको कुछ मिलता है। पांच इंद्रियों द्वारा इस जगत की वस्तुओं को, जीव-जंतुओं को, फीलिंग को, एहसास को हम समझते हैं — सुन के, देख के, सुगंध से, स्वाद से, स्पर्श से। पांच इंद्रियों से हम आदान और प्रदान करते हैं, लेन और देन।

जन्म होता है तो सबसे ज्यादा लगाव किससे होता है? मां से। क्योंकि पांचों इंद्रियों का सुख उससे मिलता है। स्तनपान करते हैं तो स्वाद मिला; उसके शरीर का सुगंध, उसके शरीर का स्पर्श, उसका रूप और उसके शब्द — पांचों मिल गए।

फिर धीरे-धीरे हम बड़े होने लगते हैं, तो सब मिलना बंद हो जाता है। रूप रह जाता है, शब्द रह जाता है; जो सुगंध था, स्वाद था, वो हट गया। धीरे-धीरे दोस्त-यार बनने लगे, तो हम बाहर भी हो गए। उधर से स्वाद-सुगंध नहीं मिला तो हमारा आकर्षण भोजन की तरफ होने लगा, मां से कम होने लगा।

मां से प्रेम, फिर वासना की तरफ

फिर बड़े होकर स्त्री है तो पुरुष, पुरुष है तो स्त्री मिल गई। अब पांचों सुख उससे मिलने लगे, तो सबसे ज्यादा आकर्षण उसी से हो गया। पहले मां से था। मां से तो प्रेम था, मोह नहीं था, क्योंकि वहां वासना जागृत नहीं थी। वहां हमें कुछ नहीं चाहिए था, सब कुछ मां अपने आप देती थी। लेकिन हम वासना की तरफ बढ़ गए।

इसके बाद उसके द्वारा बच्चे हुए, हम फिर उसमें फंस गए, क्योंकि वो मेरा खून हो गया, मुझसे है। अब पत्नी से ज्यादा लगाव बच्चों में हो गया, क्योंकि दोनों के मिलन से पैदा हुआ है।

अब देखना है कि मोह किससे है? मोह हमें मिलने से है। अगर आप देखेंगे तो आपका लगाव किसी से नहीं है। लेकिन इस बात को समझने के बाद भी हम एक-दूसरे को कहते हैं कि हम आपको बहुत मानते हैं, और एक समय ऐसा आता है कि हम उसे देखना भी नहीं चाहते। क्या हुआ? जो मिल रहा था, वो नहीं मिला।

एक दायरा है — अपने बच्चे के लिए सब कुछ

पहले हम भाई के लिए कुछ भी कर सकते थे, मां के लिए सब कुछ कर सकते थे। लेकिन अब भाई बीमार हो जाए तो उतना ही खर्च करेंगे जितना हमारे पास ज्यादा है — एक लिमिट है। मां बीमार हो जाए तो एक दायरा है: तुम भी दो, मैं भी दूंगा, मैंने ही सब लिया है क्या? भाई का लड़का बीमार हो तो दायरा होगा, लेकिन आपका लड़का बीमार हो तो उसके लिए सब बेच दोगे।

तो मोह आपको मिलने से है। अपने तरीके से जो भी आपको देता है, उससे मोह हो जाता है। सबसे ज्यादा अगर मोह का बंधन है तो स्त्री-पुरुष के मिलन में — भोग में, और उसके बाद भोजन में चार सुख मिलते हैं: छूना, स्वाद, सुगंध और रूप; शब्द नहीं मिलता। तो सबसे ज्यादा जीव कहां फंसा है? भोग और भोजन में।

आपके तरीके से जो भी आपको देता है, वो आपको बहुत प्रिय लगता है; और आपके तरीके से नहीं देता, उसे आप देखना भी पसंद नहीं करते। ये है सच्चाई, और सबको पता है — लेकिन सबकी हालत वही है।

अपने बच्चे से ही खेलना क्यों अच्छा लगता है

अपने बच्चे से खेलना अच्छा लग रहा है, लेकिन दूसरे से क्यों नहीं? वो भी तो बालक है। वो मेरा है, इसलिए — मेरा का भाव जकड़ गया। और भी तो बच्चे हैं संसार में, उनसे खेलना अच्छा क्यों नहीं लगता? वो तो अबोध हैं, बच्चे तो बच्चे होते हैं।

अब वो तो हो गया है, नेचुरली। अपने तरीके का त्याग करें। अपने तरीके से अगर उनसे कुछ उम्मीद बना के रखे हो, वो छोड़ दो। उसका त्याग करो, और आपका जो भी इनकम का सोर्स हो, वो ईमानदारी का हो, और जीवन में सत्कर्म हो।

आप उन अनजान लोगों के लिए भी करिए जिन्हें आप जानते भी नहीं। जीवन में कुछ ऐसा काम करो कि जिन्हें आप जानते भी नहीं, उनके लिए करो, और उनमें अपनत्व का भाव हो।

सेवा और मदद में फर्क

एक बार एक व्यक्ति ने कहा कि महाराज जी, आपकी मदद करने आ रहे हैं। मैंने कहा — मदद करने नहीं आ रहे हैं, सेवा करने आ रहे हैं। उन्होंने पूछा सेवा और मदद में क्या फर्क है? फर्क बहुत बड़ा है। मदद हम उसकी करते हैं जो कमजोर होता है; सेवा हम उसकी करते हैं जो हमसे श्रेष्ठ होता है।

लेकिन देते दोनों में हैं। जिसकी मदद कर रहे हैं, उससे हमें पुण्य की इच्छा है; और जिसकी सेवा कर रहे हैं, उससे आशीर्वाद की इच्छा है। देने का भाव दोनों में है, लेकिन एक में लग रहा है कि मैं कुछ हूं — उभर रहा है कि मैं कुछ हूं; और एक में दे रहे हैं ऐसे कि आप कुछ हो।

तो अपने तरीके से जो चाहिए, उसका त्याग करो, और ईमानदारी से इनकम हो।

मोह अलग है, प्रेम अलग है

मोह अलग है, प्रेम अलग है। प्रेम का मतलब होता है कुछ नहीं चाहिए। जैसे आप यहां पे आए — आपको दो दिन हो गए, हमने आपका नाम भी नहीं पूछा। लेकिन आपको परायापन लगा क्या? हम एक-दूसरे का नाम नहीं जानते, कुछ भी नहीं जानते, फिर भी आपको नहीं लगा कि किसी पराई जगह बैठे हो — क्योंकि यहां प्रेम है। ये प्रेम है, यहां प्रेम की वर्षा हो रही है, इसलिए लग ही नहीं रहा है।

समय बीत रहा है, पता नहीं चल रहा है, क्योंकि ये प्रेम है। प्रेम में समय का पता नहीं चलता है। प्रेम में परायापन नहीं लगता है।