प्रवचन PV03-0022 · भाग 3
समाधि के पल में क्या होता है — जैसे मां का दर्द, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता
16 जून 2026 · मोह और प्रेम गलत है या सही?
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मुख्य बातें
- समाधि आंख बंद करके ही होती है, ऐसा नहीं है — चलते-फिरते भी समाधि रहती है।
- जैसे मां बनने वाली उस दर्द में सब कुछ भूल जाती है, वैसे ही समाधि में साधक के पास कुछ नहीं रहता।
- उस समय ना पाप, ना पुण्य, ना राग-द्वेष, ना सुख-दुख, ना कुछ चाहिए, ना कुछ नहीं चाहिए — वहां शब्द खत्म हो जाते हैं।
- वो स्थिति साधक ने अपने हाथों से लाई है — जैसे उस दर्द तक मां को वही लाई।
- समाधि के बाद ज्ञान होता है, आत्मज्ञान होता है, और उसके बाद परमात्मा की यात्रा शुरू होती है — ऐसे जवाब आते हैं जो कभी नहीं बदलते।
समाधि आंख बंद करके ही नहीं होती
ऐसा नहीं है कि समाधि आंख बंद करके ही होती है। ऐसा नहीं है, क्योंकि मैंने वो फील किया है। घूमती हुई भी हमारी समाधि बहुत समय तक चली — महीनों, कई महीने तक चली।
जैसे मां का दर्द
किसी की भी समाधि की स्थिति आती है, जैसे एक मां बनने वाली होती है। कोई भी मादा गर्भ को धारण करती है — धारणा, ध्यान गर्भ पे गया — और जब वो स्थिति आती है तो इतना दर्द, इतनी व्याकुल हो जाती है कि उसे सब कुछ भूल जाता है। वैसे ही धारणा निर्विकार होने की कोई बना लेता है।
और जब सब कुछ खत्म होता है, तो उस समय ना पाप, ना पुण्य; राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता — ना अच्छा, ना बुरा, ना आनंद, ना परमानंद, ना कुछ चाहिए, ना कुछ नहीं चाहिए। मतलब कुछ में नहीं रहता, बात ही खत्म — ना सुख, ना दुख, एक अलग ही स्थिति।
उसके लिए क्या शब्द बोलें? शब्द नहीं, क्योंकि वहां शब्द खत्म हो जाते हैं। जैसे एक मां दर्द में है — अगर आप उससे पूछोगे कि दर्द की स्थिति क्या थी, तो क्या बताए? उसके लिए शब्द नहीं हैं। दर्द था, लेकिन कैसा दर्द था — संसार में सबसे भयानक दर्द, और सबसे अद्भुत सुकून।
सब उसने अपने हाथों से खत्म किया
ऐसी साधक की स्थिति होती है — उसे पीड़ा भी नहीं बोल सकते, उसे खुशी भी नहीं बोल सकते। वहां कोई मांग ही नहीं रहती, कोई इच्छा ही नहीं रहती। उसके पास कुछ रहता भी नहीं, ना कुछ चाहिए; और सब उसने अपने हाथों से खत्म किया है, सब उसने ही खत्म किया है।
कोई मां बनी, तो उस दर्द को लाया किसने? उसने ही लाया ना। उस दर्द तक उसको कौन लाया? वही लाई ना। तो उस दर्द को वो व्यक्त नहीं कर सकती। इसलिए समाधि की स्थिति को व्यक्त नहीं किया जा सकता, समाधि के भाव को बोला नहीं जा सकता।
लाज, शर्म, भय — सब खत्म
उस समय साधक के पास कुछ भी नहीं रहता। जैसे एक मां दर्द से गुजरती है, उस समय सब भूल जाती है — वो कहां है, कहां नहीं है, उसके सामने कौन है। जिस अंग को छुपाने के लिए वो यहां से लेकर यहां तक कपड़े पहनती है, उस समय सब खत्म हो जाता है — लाज, शर्म सब। वैसे ही साधक की स्थिति होती है, क्योंकि मैं उस स्थिति में जिया हूं। लाज, शर्म, डर, भय — सब खत्म हो जाता है।
समाधि के बाद आत्मज्ञान, फिर परमात्मा की यात्रा
समाधि के बाद ज्ञान होता है, और ज्ञान आत्मज्ञान होता है, और उसके बाद परमात्मा की यात्रा शुरू होती है। समाधि में एकदम जगत से मुक्त हो गया, हर चीज का जवाब आ गया। उसके बाद आगे की यात्रा — परमात्मा की तरफ फिर वो अपने आप लेके चलता है।
पहले तो आत्मा की तरफ ले जाएगा ना। उसके बाद परमात्मा के उन सवालों के जवाब आते हैं, जो जवाब कभी बदलेगा नहीं। जो जवाब इस संसार का है, जो बदलता रहता है, वो नहीं आता — उससे उसका कोई मतलब नहीं। आत्मज्ञान के बाद ही परमात्मा की यात्रा शुरुआत होती है वहां से।
मैं अपनी स्थिति बयां नहीं कर सकता। मैं वही तो कह रहा हूं आपसे — एक मां उस दर्द को कैसे बयां करे? ना सुख था, ना दुख था, ये भी नहीं बोल सकती। परम सुख तो बच्चे का जन्म हुआ तब मिला, लेकिन उस दर्द को कैसे बयां करे? उस समय उसके पास कुछ भी नहीं होता, सब खत्म रहता है। वैसे ही साधक के पास सब खत्म हो जाता है — ना उसके पास कुछ है, ना कुछ चाहिए।