प्रश्नोत्तर P1-0177 · भाग 1
तो क्या मान के चक्कर में ही हमने जरूरत से ज्यादा व्यवस्थाएं इकट्ठा करने की कोशिश की है, उसके पीछे भाग रहे हैं?
हां, ज्यादातर मान के चक्कर में। आप देखो तो आपने जरूरत से ज्यादा हासिल कर लिया, इतनी दौड़ लगाई — क्योंकि मेन दौड़ आपको योग की तरफ लगानी थी, और आपने भोग की तरफ इतनी दौड़ लगाई कि हद से ज्यादा हो गया, और हद से ज्यादा परेशानियां भी हो गईं। जितना सामान बढ़ेगा, उसकी सुरक्षा और देखभाल में भी तो समय देना पड़ेगा।
मेरा लोगों से यह कहना है — देख लो शरीर ज्यादा से ज्यादा कितना चलेगा, और महीने का कितना खा सकते हो। अगर उतनी प्रॉपर्टी, उतनी सेविंग हो गई है, तो बंद करो और योग-साधना करो, अपने आत्मिक कल्याण में लग जाओ। लोग कहते हैं 60 के बाद निकलेंगे — 60 के बाद घुटने चलते नहीं, जहां जाओगे सबको शारीरिक-मानसिक परेशान करोगे, क्योंकि तुम एक रोगी व्यक्ति हो। 60 के बाद नया बदलाव कैसे होगा? बातों का इतना संग्रह हो जाता है और एनर्जी बचती नहीं; जिन इंद्रियों से लेन-देन कर रहे थे, सब कमजोर हो गईं; जब समझने की क्षमता थी, तब कुछ और भर लिया। रोज किसी बीमारी से जूझोगे — घुटना, कमर, गैस, आंख, कान — खुद उलझे रहोगे और लोगों को उलझाए रखोगे।
मैं तो कह रहा हूं कि अध्यात्म बचपन से, कुमारावस्था से आना चाहिए, जब एनर्जी होती है; बच्चों को सिखाना चाहिए। उसी समय आप कुछ कर सकते हो — जज्बा होता है, आत्मविश्वास होता है। आर्मी 18 में भर्ती करती है और जल्दी रिटायर करती है; सरकार 60 में रिटायर कर देती है; 60 में कोई नौकरी पकड़ना चाहे तो चाहने से क्या होगा? यह हर जगह लागू होता है। अगर अध्यात्म में उस परम स्थिति को उपलब्ध होना चाहते हो, तो सबसे अच्छा समय है कुमारावस्था — 16-17-18 से; इसमें व्यक्ति लग गया तो परम स्थिति को उपलब्ध हो जाएगा। 60 में जिस साधन (शरीर) से साधना करनी है, वह उस लायक ही नहीं रहता — यह मैं सच्चाई बता रहा हूं। युवाओं को मैं यह सलाह नहीं दूंगा कि 60 के बाद आओ; कुमारावस्था में आओ। लेकिन कोई कहे कि 60 का हो गया, तो मैं कहूंगा — आओ, कम से कम अभी से शुरुआत करो।
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