आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P16-0111 · भाग 16

इस दुनिया में इस ज्ञान के साथ जीना बहुत मुश्किल हो रहा है।

लेकिन जी तो सकते हैं। मैं भी तो इसी दुनिया में काम कर रहा हूं, देख रहे हो — यही दुनिया के लोग हैं, इन्हीं के लिए कर रहा हूं, इनके साथ ही कर रहा हूं। तो बड़े आराम से ईमानदारी से जी सकते हो, क्योंकि ईमानदारी आपका मूल स्वभाव है। बेईमानी तो आपने जबरदस्ती अपने से करवाई है — आप थोड़ी चाहते थे, लेकिन मान के चक्कर में, बड़ा बनने के चक्कर में, आगे बढ़ने के चक्कर में, एक सोसाइटी मेंटेन करने के चक्कर में बेईमानी कर बैठे। ईमानदारी के लिए तो कोई प्रयास ही नहीं करना है, प्रयास तो बेईमानी के लिए करना पड़ता है। तो आप बेईमानी करना छोड़ दो बस; ईमानदारी तो आपके कर्म में स्वाभाविक होती है। ईमानदारी आग है, तभी तो सारे बंधनों को जला देगी। सत्कर्म घी का काम करता है, और सत्संग यह समझ देता है कि क्या जलाना है — क्या छोड़ना है, क्या पकड़ना है। तो हमें निकलने के लिए ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग ये तीनों चाहिए। सत्संग मतलब सत्य तक पहुंचने वाले से निकला हुआ ज्ञान; वही सत्य तक ले जाएगा। अगर हम उसके शब्दों में जी रहे हैं तो हम उसके संग हैं। तो इसको लेकर आगे बढ़ जाओ, अपना कल्याण कर लो। ये मिल ही गया है, अब खोजना भी नहीं है, अब इस पे चलना है। अभी समझ भी है, समय भी है — ऐसा ना हो कि समझ है और समय चला जाए। पता नहीं अगला सांस हम ले पाएं कि नहीं, लेकिन अगर शरीर छूटे तो यह कह सकें कि हमने ईमानदारी में छोड़ा; अगला शरीर लें तो ईमानदारी से जिएं। जब तक लेन-देन से मुक्त नहीं होंगे, शरीर तो लेना पड़ेगा; तो मैं ईमानदार बनके लूं, बेईमान बन के शरीर धारण ना करूं, क्योंकि हमारे कर्म से ही हमारा अगला शरीर तैयार होगा। या तो खोज के जाओ, तब तो मूल तक पहुंच जाओगे; या तो खोज में जाओ, तो अगला शरीर फिर मानव तन पाओगे कि आप उसे खोज सको, क्योंकि इसी शरीर में कर्ता का अधिकार है। भोग में जाओगे तो अगला शरीर भोग योनि में मिल जाएगा। तो सर्वप्रथम पूरी तरह ईमानदार बन जाओ, कि आप अपने आप से कह सको कि मेरा रोम-रोम ईमानदार हो गया।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: ईमानदार तो सिर्फ ईमानदार #योगी · 2026-02-28