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प्रश्नोत्तर P21-0152 · भाग 21

गुरु जी, मेरे प्रभाव में आकर एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को पैसा दिया। उस वक्त लगा कि मैंने अच्छा किया, लेकिन बाद में उसने पैसा कभी वापस नहीं किया, और मैं बीच में थी, इसलिए मुझे बहुत धक्का लगा। पहले तो मैं सहायता करने के लिए बीच में गई, अब उल्टा हो गया — अब मेरा आखरी भाव क्या रहना चाहिए?

अब आपको जांचना है कि अगर मैंने उसकी मदद करवानी चाही तो क्यों? ऐसे तो नहीं करवाओगे, कोई तो बात होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसकी मदद करा के उसके द्वारा मैं कुछ लेना चाहती थी — कहीं लालच में मदद करवाई? अगर जिस आदमी के लिए मदद करवाई वो उस लायक नहीं था, लेकिन वो आपको कुछ दे सकता था इसलिए करवाया, तो ना उसका दिया ना आपको दिया — और अब गुस्सा आने का कोई कारण ही नहीं, क्योंकि आपने लालच में मदद करवाई; आपने पहले आदमी को भी धोखा दिया — क्या आपने उसे बताया कि मैं इससे कुछ लूंगी? घटनाओं में ना जाके बात को समझना। ये लेन-देन की दुनिया है — मैं भी यहां आया हूं कि आपको ऐसा मार्ग बता दूं कि आपका आत्मिक कल्याण हो जाए, और आप आए हो कि मुझे ऐसा मार्ग मिल जाए। जब आपने एक व्यक्ति का चुनाव किया, जबकि आपके सामने और परेशान लोग खड़े हैं — पड़ोसी सबसे ज्यादा परेशान है — तो उसके प्रति आपका मोह है, कुछ ना कुछ उससे आपको मिल रहा है। आपने दोनों की योग्यता को जाने बिना, धोखे में ये करवाया — उसको भी धोखे में रखा, उसको भी, अपने आप को भी। लालच में कभी किसी की सहायता मत करो। सहायता ऐसी करवाओ कि दोनों को स्पष्ट बोल दो — "इसकी सहायता कर रहे हो, वापस मिलेगा कि नहीं मुझे नहीं पता, अब करो चाहे ना करो, मैंने मिला दिया है।" या तो जिम्मेदारी लो, तो फिर ताकत रखो युद्ध करने की — अपने अधिकार के लिए जो युद्ध करता है वो वीर होता है। आप कुछ कर रहे हो तो सामर्थ्यवान होकर करिए, लालच में कुछ मत करिए; या तो खुद करो बिना इच्छा-अपेक्षा के — क्योंकि इच्छा-अपेक्षा ही मेरे दुखों का कारण है। देखो मैं क्यों कर रहा हूं, क्या मेरी सामर्थ्य स्वयं की है — ऐसा तो नहीं कि इसको भी परेशान करूंगा, उसको भी, और खुद को भी।

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वीडियो: मैं कहां हूं ? कर्नाटक कलबुरगी में पुनः सत्संग 5 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-06