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प्रश्नोत्तर P21-0153 · भाग 21

गुरु जी, घर वाले एक स्वामी जी को मानते हैं जो वास्तु दोष बताते हैं — ये दरवाजा उस तरफ कर दो, ऐसा कीजिए तो वैसा होगा — और कभी-कभी जैसा वो बोलते हैं वैसी घटना घट भी जाती है, तो हमें कंफ्यूजन होता है। हम क्या करें?

हम सबको पता है — कर्म के सिद्धांत को समझो: जैसा मैं कर रहा हूं वैसा मुझे मिल रहा है। अगर दोष है तो मेरे कर्मों में है। अगर किसी के कहने से कुछ होता तो दुनिया में ना कंपनी होती, ना बिजनेस, ना व्यापार। हम यहां आत्मिक कल्याण के लिए आए हैं — मैं कौन हूं, मैं कहां हूं, इस पर बात करनी है; उन सवालों पे समय देने की कोई आवश्यकता नहीं। अगर आपको ठीक लगता है तो स्वामी जी की बात मानिए, नहीं ठीक लगता तो मत मानिए — यह फैसला आपको लेना पड़ेगा। जैसे विद्यार्थी जब लायक नहीं रहता तो विषय का चुनाव स्कूल करता है, लेकिन लायक हो जाता है तो फॉर्म वो भरता है — फैसला उसे लेना पड़ता है। ना तुम्हारी कमी है, ना स्वामी जी की; कमी सिर्फ इतनी है कि तुम फैसला नहीं ले पाए — कभी स्वामी जी की मान लोगे, कभी मेरी, फिर दूसरा स्वामी जी तैयार है। अगर वैभव से किसी का कल्याण होता तो मीराबाई, बुद्ध, महावीर, राजा भर्तृहरि भिक्षुक नहीं बनते — सोने के बर्तन में खा रहे थे, जरूर उस सोने में सुख नहीं था, तभी छोड़ा, और जंगलों में जाकर अपने आचरण को बदला, बुरी आदतें छोड़ीं, तब परम आनंद को उपलब्ध हुए। आपका कल्याण कर्म के सिद्धांत को समझने में है, आचरण को बदलने में है, धर्म को समझने में है — परोपकार धर्म है। तो मुझे ईमानदारी से जीवन जीना है और जरूरतमंद की सेवा करते हुए, जिस लायक हूं — धन से, तन से, अपनी समझ से — निकल जाना है। पहले आप अपने अंदर का दरवाजा सही करो — गंदगी भरना बंद करो, बेईमानी बंद करो; बेईमानी का दरवाजा बंद करो और ईमानदारी का दरवाजा खोलो, जिसमें परम आनंद है। ईमानदारी आग है। तुम कितनी भी साधना कर लो, ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी आ जाएं, अगर तुम बेईमान हो तो तुम्हारा कल्याण नहीं कर सकते — तुम्हारा कल्याण तुम ही कर सकते हो। और तुम्हें पता है तुम कहां-कहां बेईमान हो, हर व्यक्ति को पता है। तो दरवाजा इधर-उधर करना ही है तो बेईमानी वाला करो — और ईमानदारी के साथ सत्कर्म में जीवन लगाओ, तब जाके कुछ होगा।

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वीडियो: मैं कहां हूं ? कर्नाटक कलबुरगी में पुनः सत्संग 5 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-06