प्रश्नोत्तर P21-0163 · भाग 21
गुरु जी, हमने आज तक पढ़ा है कि गुरु के मुख से सुनो, मनन करो, नित्य अभ्यास करो; लेकिन आप कह रहे हो कि बेईमानी छोड़ दूं, ईमानदारी अपना लूं और सत्कर्म करूं — क्या केवल इससे आत्म साक्षात्कार संभव है, इसके अलावा कोई दीक्षा नहीं चाहिए?
बेईमानी छोड़कर ईमानदारी-सत्कर्म धारण करना — एक छोड़ना है तो एक पकड़ना है; एक समय ऐसा आएगा कि ईमानदारी भी छूट जाएगी। मैं आपसे पूछता हूं — दो व्यक्ति आपके सामने रख दिए जाएं: एक व्यक्ति पूजा करे, पाठ करे, 100-200 माला रोज करे और दिन भर बेईमानी करे; और एक व्यक्ति ईमानदारी से सत्कर्म के साथ जीवन जिए — कल्याण किसका होगा? ईमानदारी से सत्कर्म वाले का। तो बस, खत्म बात। साधना यही है — ईमानदारी और सत्कर्म से ही होगा; इसके अलावा कुछ भी अपनाओ, अगर ये नहीं अपनाए तो कभी नहीं होगा — कोई भी साधना कर लो, उससे पतन होगा। शुरुआत यही है और ये आखरी तक रहेगा। इसके अलावा कोई दीक्षा की जरूरत ही नहीं, क्योंकि ईमानदारी तपस्या है, तप है, आग है। हमने बेईमानी की तो जिससे की उसकी बद्दुआ लगी; ईमानदारी अपनाएंगे तो बद्दुआ लगना बंद हो जाएगा — बंधन वाला काम बंद हो गया। फिर सत्कर्म अपनाएंगे, जरूरतमंद की सेवा करेंगे, तो उसकी अंतरात्मा से आशीर्वाद मिलेगा, और वो आशीर्वाद उस श्राप को काटने में सहायक बनेगा। धीरे-धीरे जब पूरी तरह निर्विकार हो जाऊंगा, विकारों से मुक्त हो जाऊंगा, तब आत्म साक्षात्कार हो जाएगा। ये अपना लिए तो उस परम सत्ता तक पहुंच जाओगे जहां से आप आए।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: मैं कहां हूं ? कर्नाटक कलबुरगी में पुनः सत्संग 5 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-06