प्रश्नोत्तर P21-0171 · भाग 21
गुरु जी, ईमानदारी में बहुत बार हमें दूसरों को झेलना पड़ता है — उस प्रेशर को हम कैसे हैंडल करें?
आपकी ईमानदारी और बेईमानी का पता विपरीत परिस्थितियों में चलता है। अनुकूल परिस्थितियां हैं तो आप सरल भी हो, सहज भी, ईमानदार भी — बेईमानी का ऑप्शन ही नहीं तो आप ईमानदार हो। जब विपरीत परिस्थितियां बनें तब देखो कि आप किसका साथ देते हो — ईमानदारी का या बेईमानी का; आपके अंदर लालच है या नहीं, ये भी विपरीत में पता चलता है। मैं कामाख्या (गुवाहाटी) साधना करने गया था; जहां से पैसा आना था उसका नंबर नहीं लग रहा था — भोजन करूं तो मुंबई का किराया नहीं, किराया रखूं तो भोजन नहीं। मुझे ज्योतिष आता है, हाथ-कुंडली देख के पैसा पैदा कर सकता था, लेकिन ये नहीं कर सकता। रात काल भैरव मंदिर में रुका, दो शराब पीने वाले आए, जिद करके हाथ दिखाया, मैंने कुछ बता दिया तो पर्स के सारे पैसे रख गए; मैंने कहा मैं लूंगा नहीं — सुबह सारा पैसा पुजारी को दिया और चला गया। समझाना होता तो अपने आप को समझा देता — हम तो बेईमानी में भी अपने आप को ईमानदार बना देते हैं; लेकिन नहीं लेना है तो नहीं लेना। ट्रेन में भूखा रहा, लोगों ने खाना पूछा तो कहा भूख नहीं है — तब मुझे अपने त्याग का पता चला। ऐसे ही विरार में आठ महीने का व्रत चल रहा था, फलाहार के पैसे नहीं, दवा के नहीं; चावल-घी, हीटर सब था, कोई देखने वाला नहीं — पर मैं तो देख रहा था, मैं गिर जाता, साधना टूट जाती; रात को लगा आज मर जाऊंगा, बहुत रोया, लेकिन खाया नहीं। एक दिन पैसे की बहुत जरूरत थी, एक यजमान जो हर बार 1000-2000 देता था, उसकी पूजा कराने गया; जब वो पैसा देने लगा तो मैंने कहा आज नहीं लूंगा — लालच ने जन्म लिया लेकिन मैंने उसको मार दिया; जब लालच का जन्म हो तो उसे अंकुरित में ही मार दो। केदारनाथ यात्रा में मेरे पांव सड़ गए थे, खून बहता था, रात हो गई, साथी छोड़ गए, एक दुकानदार ने कहा मेरे गांव रुक जाइए — मैंने कहा आज नहीं पहुंचा तो डर जीत जाएगा और मैं हार जाऊंगा; मरूंगा तो लक्ष्य की तरफ मुंह होगा, पीठ नहीं; चल दिया और दर्द खत्म हो गया, चाल तेज हो गई। जब आप ईमानदारी अपनाओगे तो आपकी परीक्षा होगी ही — परीक्षा नाम लिखाने वाले बच्चों की होती है, स्कूल के बगल में घूमने वालों की नहीं; फटकार-तकलीफ ईमानदार को ही झेलनी पड़ती है, लेकिन बेईमान का भी समय आएगा। आप जिस मार्ग में चल रहे हो, बहुत संघर्ष आएंगे, बहुत विपरीत परिस्थितियां — हो सकता है परिवार का ही सामना करना पड़े; लेकिन डरना नहीं, क्योंकि डर गए तो घुट-घुट के मरोगे। या तो खोज लो तो मरने से मुक्त हो जाओगे, या खोज में मरो तो वीर गति को प्राप्त हो जाओगे — लेकिन भागो मत; भगोड़े की कोई इज्जत नहीं करता, और तुम खुद अपनी इज्जत नहीं करोगे। ये अकेले का मार्ग है — तुम्हारी तुमसे मुलाकात तभी होगी जब तुम्हारे अलावा कोई नहीं होगा। संघर्ष उसी के जीवन में होता है जिसका लक्ष्य होता है। पूरा परिवार आपके साथ तब होता है जब आप पैसा कमाओ, बाहर की चीजें लाओ; जिस दिन अपने लिए सोचना चालू किया, साथ छोड़ देंगे। बिना गलती के लोग गालियां देंगे, मारेंगे, क्योंकि उन्हें पता है तुम जवाब नहीं दोगे — और जवाब दिया तो लक्ष्य से वंचित रह जाओगे।
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वीडियो: मैं कहां हूं ? कर्नाटक कलबुरगी में पुनः सत्संग 5 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-06