प्रश्नोत्तर P21-0180 · भाग 21
गुरु जी, ईमानदारी पहला स्टेप है — लेकिन वो ईमानदारी क्या है, मैं समझ नहीं पा रही।
मैं किसी को देख रहा हूं तो किस भाव से देख रहा हूं — क्या उसे नीचा दिखाना चाहता हूं? मैं कपड़े भी पहन रहा हूं तो किस भाव से — सामने वाले को नीचा दिखाने, अपने को बड़ा बनाने, या जरूरत में? किसी से बात कर रहा हूं तो बनावटी बात तो नहीं, कि उससे कुछ लेना है, चाहे मान-सम्मान हो? मैं अपना पद बता रहा हूं — क्या पद बताना जरूरी है, उसका कोई उपयोग होगा, या इसलिए कि वो मुझसे झुक जाए? मैं चल रहा हूं तो शालीनता से या अकड़ में, किसी को आकर्षित करने के लिए? मैं जहां हूं वहीं बता रहा हूं? सबसे ज्यादा बेईमानी बोलचाल में होती है — अपने मान के लिए हम अपना परिचय बताते हैं; जरूरत है तो बताओ, नहीं तो मत बताओ। कोई सामान दे रहा हूं तो जैसा बता रहा हूं वैसा ही है? किसी की हेल्प कर रहा हूं तो भाव क्या है — सच में हेल्प, या उसे गुलाम, मजबूर, लज्जित बनाना? किसी की कमी बता रहा हूं तो उसे ऊपर उठाने के लिए या लज्जित करने के लिए — क्या मुझमें वो कमी निकालने की क्षमता है? और जो मैं बता रहा हूं क्या उसमें खुद जीता हूं — बच्चों से कहता हूं झूठ मत बोलो, बड़ों का सम्मान करो, तो क्या मैं करता हूं? पहले तुम झूठ बोलना बंद करो, फिर कह सकते हो; कहीं से उठाया, कहीं दे दिया — उसका भी दोष लगता है। तो अंदर से जो शब्द निकल रहे हैं, अंदर और बाहर वाले शब्द मैच कर रहे हैं — तब तुम ईमानदार हो; अंदर कुछ और बाहर कुछ और, तो बेईमान। सामने वाले को पता हो या ना हो, आपकी बेईमानी और ईमानदारी का आपको पूरा पता है। कर्म दिखता है, भाव नहीं दिखता — कर्म के पहले और बाद जो भाव बनता है उससे फल का निर्णय होता है; किसी को एक गिलास पानी पिला रहे हो, किस भाव से पिला रहे हो ये आपके अलावा कोई नहीं जानता, और ना सिद्ध किया जा सकता है। इसी में मेरा उद्धार छुपा है, इसी में मेरा पतन। बीज को सही जगह लगाओगे तो वृक्ष तक पहुंचेगा, गलत जगह लगाया तो सड़ जाएगा।
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वीडियो: मैं कौन हूं ? कर्नाटक कलबुरगी में पुनः सत्संग 28 जून 2026 #योगी · 2026-06-29