प्रश्नोत्तर P21-0186 · भाग 21
गुरु जी, जरूरतमंद को हम कैसे पहचानें? जैसे भूकंप हो गया, लोग घर-घर आकर कहते हैं उनके लिए कुछ दे दो — हम भरोसे पर दे देते हैं, तो ये सत्कर्म में आता है या पुण्य में?
अगर मैंने दिया है तो पूरे समाज को दिया है — ऐसा नहीं कि नाम पूछ के दिया कि क्या तुम मेरे समाज से हो; तब ये सत्कर्म नहीं हुआ। बिना जाति, बिना समाज, बिना कुछ पूछे आप जरूरतमंद की सेवा कर रहे हो तो ये सत्कर्म है। बीच में जो काम कर रहे हैं — तो आप जितनी सामर्थ्य है उतना पता करके दो, फिर वो जानें उनका काम जाने। जैसे किसी ने कहा मुझे भोजन के लिए पैसा चाहिए, आपने दे दिया, वो जाकर शराब पिए तो दोषी वो होगा, आप नहीं — आपका स्तर उठ गया। लेकिन देने से पहले पूछो — आप किसी को बल दे रहे हो, धन का, तन का, समझ का, तो पूछो इस बल का उपयोग क्या करोगे। मैं एक जगह महाराज जी के पास था; एक व्यक्ति आया, बोला माचिस चाहिए; महाराज जी ने दे दी, मैंने कहा रुको — माचिस का क्या करोगे? बोला खेत में आग लगानी है। मैंने कहा जितने जीव-जंतु मरेंगे उसका जिम्मेदार कौन — जा अपने घर से माचिस ला, मैं इसमें निमित्त नहीं बनना चाहता। अगर उसने कहा होता कि भोजन पकाऊंगा, और फिर जाकर आग लगाता, तो दोषी वो होता। पूछा नहीं तो वो जहां भी उपयोग करेगा, उसके दोषी आप भी — अच्छा किया तो भी मिलेगा, बुरा किया तो भी। वैसे ही दया-करुणा — देखो किस पर कर रहे हो, क्या वो दया का पात्र है, ऐसा तो नहीं कि वो दंड का अधिकारी है; और कहीं आप किसी का अधिकार तो नहीं छीन रहे। बहुत संभल के चलना है — इसलिए जीवन में सत्संग जरूरी है।
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वीडियो: मैं कौन हूं ? कर्नाटक कलबुरगी में पुनः सत्संग 28 जून 2026 #योगी · 2026-06-29