प्रश्नोत्तर P21-0190 · भाग 21
गुरु जी, मेरे दो प्रश्न हैं — पहला, अहंकार और शरीर ही मेरी पहचान है, तो अपनी असली पहचान समझने का मकसद क्या है? दूसरा, यहां जितने लोग जमा हैं ज्यादातर बुजुर्ग हैं; सबने आज तक घर-परिवार चलाया, पर परिवार के सदस्य अपनी मनमानी करके चले गए — तो ऐसे लोगों को पालने का क्या मतलब?
मैं कौन हूं — ये मुझे इसलिए जानना जरूरी है कि मैं जहां हूं वहां दुखी हूं, निराश, हताश, उदास हूं; जिसके लिए मैंने किया वही मेरे दुखों का कारण बन गया। आपने परिवार के लिए किया, लेकिन लोग आपके अनुसार नहीं कर रहे — मैंने कर दिया; उन्होंने जिस प्रवृत्ति को धारण किया है उसी में वो जिएंगे। मेरा दायित्व, मेरा कर्तव्य मैंने पूरा कर दिया — मुझसे मतलब नहीं, वो जानें उनका कर्म जाने। अब मुझे ये देखना है कि मैं क्या करूं कि अपने मूल तक पहुंच जाऊं। मैं दुख, अशांति, राग-द्वेष, मोह से बेचैन हूं, इससे छुटकारा पाना चाहता हूं — और छुटकारा तभी पाऊंगा जब अपने मूल को जानूंगा, और मूल को तभी जानूंगा जब ये सब छोड़ूंगा, अपने बनाए हुए नकली अस्तित्व को मिटाऊंगा। सुख के चक्कर में मैंने बहुत दुख पाया — जो किया सुख समझ के किया, परिणाम में दुख आया। तो जिसके अंदर ये भाव आएगा कि मैं दुखों से मुक्त होना चाहता हूं, वही "मैं कौन हूं" की खोज करे। अगर मैं जहां हूं वहां खुश हूं तो ये प्रश्न ही नहीं उठेगा, क्योंकि वो भी तो मैं हूं। जब सब करके, जो चाहा बनाकर, जो चाहा पाकर भी बेचैन हूं, तब प्रश्न उठता है कि इससे छुटकारा कैसे पाया जाए।
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वीडियो: मैं कौन हूं ? कर्नाटक कलबुरगी में पुनः सत्संग 28 जून 2026 #योगी · 2026-06-29