प्रश्नोत्तर P22-0007 · भाग 22
गुरु जी, जीवन में दुख है तो जीना क्यों है?
जीवन में दुख नहीं है, जीवन में तो आनंद है। जीवन में कहां दुख है? बोरिंग इसलिए लगता है कि आप जैसा चाहते हैं वैसा नहीं होता — बस। आप स्वाद में फंस गए, टेस्ट में फंस गए। जीवन को तो जरूरत में जीना था — एक अपनी जरूरत में और एक सामने वाले की जरूरत में; आप जरूरत से ज्यादा में गए, अपनी चालाकी में, मान-सम्मान के चक्कर में, नाम-शोहरत-पैसे के चक्कर में, बड़ाई के चक्कर में आ गए। गलती तो आप कर बैठे। जो एक अनजाना सा दुख लगा हुआ है, जो गैप है, उसे भरने की कोशिश करते हो — यह भर लो, यह कर लो — फिर पता चलता है फिर खाली का खाली। आप भरना चाहते हैं, जीना नहीं चाहते। जीवन मिला है जीने के लिए, जीवन-मरण आपके हाथ में तो है नहीं; तो जीवन को जियो ना। इस दुनिया में ऐसे भी लोग रहे जो आनंद की मस्ती में जिए। आप जरूरत में जीना चालू कर दो — क्योंकि जीवन है तो एक नहीं, दो हैं: एक अपनी जरूरत देख लो, एक सामने वाले की जरूरत देख लो। जरूरत से ज्यादा चाहिए, वही दुख-सुख है — मिल गया तो सुख, नहीं मिला तो दुख। जीवन में दुख हमने पैदा किया है सुख के चक्कर में। हमें स्वाद लग गया है — मान का स्वाद, बड़ाई का स्वाद, बड़ा-छोटा बनने का स्वाद, योग्यता से ज्यादा पाने का स्वाद — इसी में फंसे हैं, और जब तक यह रहेगा आपके जीवन में दुख ही रहेगा। गाड़ी से कब दुख होता है? जब उससे अच्छी गाड़ी किसी ने ले ली, वह भी आपका परिचित। तो तुलना में सुख-दुख है; जब तक जीवन तुलना में रहेगा आप ऐसे ही दुखी रहोगे, क्योंकि एक से बढ़कर एक है। जरूरत में जियो — जितनी जरूरत है उतने में ही संतोष होना है, उससे ज्यादा तो फिर लालच है। हम अपनी कार में मस्त जा रहे थे, कोई दुख नहीं था; जैसे ही फुर्र से एक बड़ी कार निकली, दिमाग एकदम बौखला गया — यहां बात तुलना की है। अगर तुलना छोड़ दो तो आप जीवन में एकदम मस्ती में हो।
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वीडियो: जिंदगी में दुख है तो जीना क्यों है ? #योगीजी_का_सत्संग · 2025-03-05