प्रश्नोत्तर P22-0035 · भाग 22
गुरु जी, हम यहां आसन में बैठे हुए हैं, आप आनंद की बातें कर रहे हैं, लेकिन शरीर और इंद्रियों द्वारा दर्द की संवेदना पहुंच रही है — इस अवस्था में इसे कैसे भुलाया जा सकता है?
वह शरीर का दर्द है, और आप कहीं लगे हुए हो — आप महत्व किसको देते हो, अपने आप को या शरीर के दर्द को? अपने आप को दोगे तो दर्द की तरफ आप जाओगे ही नहीं, वह धूमिल पड़ जाएगा। जैसे आपके सामने एक व्यक्ति बीमार हो, आप बहुत दुखी हो; कुछ देर बाद आपका बेटा उससे भी ज्यादा बीमार हो जाए, तो पहले वाले की बात धूमिल पड़ गई ना? जिस दिन आपका महत्व आपके जीवन में समझ में आ जाएगा, उस दिन आप शरीर के दर्द में जाओगे ही नहीं। आपको आपका महत्व ही नहीं मालूम; आपको बस बाहरी आवरण का महत्व सिखाया गया है — गाड़ी, बंगला, घर, कपड़े, मकान, जायदाद, पैसा-रुपया, सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात — इन सबका महत्व अपने जीवन में दे दिया है। महत्व देने की एबिलिटी पर ही सारा कुछ निर्भर करता है — आपने किसे महत्व दिया है, आपके लिए क्या जरूरी है?
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