आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P22-0047 · भाग 22

गुरु जी, कहते हैं वैराग्य में दमन की प्रधानता है और गृहस्थ लोग विवेक की प्रधानता पर चलते हैं; शंकराचार्य जी कहते हैं इसके बाद भी तितिक्षा चाहिए — प्रकृति द्वारा दिए सुख-दुख को ना चाहते हुए भी सहने का सामर्थ्य। हम अभी दमन पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं — जैसे दर्द हो रहा है तो उसे महत्व नहीं देना, इच्छा को मार देना — यह दमन है?

परिवार में अगर आप रह रहे हो तो विवेकपूर्ण होना चाहिए। लेकिन जो आप कर रहे हो उसे दमन नहीं कहते, उसे अनदेखा करना — उपेक्षा — कहते हैं। दमन का मतलब है उसे दबाना; आप दबा नहीं रहे, अनदेखा कर रहे हो। दमन नहीं करना चाहिए — समझना चाहिए।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: माया को सस्ती क्यों कर देती है ब्रह्म की मस्ती ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-21