प्रश्नोत्तर P22-0048 · भाग 22
गुरु जी, समझ के स्तर से क्या शरीर का दर्द ओवरलुक हो पाता है? जैसे आज पूरे दो घंटे सत्संग में बैठकर सुनते रहे तो दर्द की उपेक्षा हो गई। मानसिक सहन तो समझ में आता है — विचारों और इच्छाओं की उपेक्षा कर सकते हैं — पर शारीरिक सहन में समस्या है।
इलाज करवा दो; और जिसका कोई इलाज नहीं — जैसे आप बैठे हो और दर्द हो रहा है — तो उसे सहना ही पड़ेगा। देख लो आपके लिए जरूरी क्या है, सहना कि सुनना; सुनना जरूरी है तो सहते रहो, और क्या करोगे। माताजी पहले से सह रही हैं — पहले मानसिक सह रही थीं, अब शारीरिक सह रही हैं, उनके लिए कोई नया नहीं। और शारीरिक सहन में समस्या है तो फिर मत रहो, घर जाओ — ऑप्शन तो है ना; जिस गाड़ी से आए हो वैसे ही चले जाओ। सह भी रहे हो तो अपने आप के लिए — आपके सहने में आपका हित है, दूसरों का नहीं; और नहीं सहना हो तो "नर्मदे हर" — यह भी ऑप्शन है। आर्मी में भर्ती होना है तो गद्दा-गद्दी नहीं छोड़ोगे तो भर्ती हो पाओगे? वर्दी ऐसे ही नहीं मिल जाती, बहुत टफ ट्रेनिंग होती है; जाके कहोगे "मैं नहीं सह पाऊंगा" तो भगा देंगे — क्योंकि जब पता है कि यह पास नहीं हो पाएगा तो इसे दौड़ा के क्या मतलब, इसका समय बर्बाद मत करो। यह तो अभी शुरुआत है; आगे इससे भी ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा — एक समय ऐसा आएगा कि कहोगे इससे अच्छी तो मृत्यु है, एक बार में मार देगी। स्व में स्थिर होने के लिए अथाह दुखों का सामना करना पड़ता है। इसलिए मैं लोगों को सलाह देता हूं कि कुछ नहीं चाहिए तो इसमें आगे बढ़ना — सब खत्म हो जाएगा।
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