प्रश्नोत्तर P23-0004 · भाग 23
गुरु जी, थोड़ी देर पहले आपने कहा था कि गुरु बारह बरस तक परीक्षण करते थे और उसके बाद मंत्र देते थे; तो ये आपकी ही बात का खंडन हो गया?
खंडन नहीं हुआ, उसे मैं समझाऊं। खंडन होता तो मैं बोलता ही नहीं; मैं जितना बोल रहा हूं, समझ है तभी बोल रहा हूं, और आपके भ्रम को तोड़ने के लिए ही बोल रहा हूं। यहां पर मैं कृष्ण और गीता की बात कर रहा हूं। जब हमें 'हरे कृष्णा' जपने के लिए बोला जाता है — क्या कृष्ण भगवान ने बोला कि अर्जुन, मेरा नाम जपो? नहीं, उन्होंने कर्म का सिद्धांत बताया। अर्जुन किस जगह खड़े थे? गृहस्थ जीवन में; उनका दायित्व था, जिम्मेदारी थी, कर्म करना बहुत जरूरी था, तो उन्होंने कर्म का सिद्धांत बताया। वाल्मीकि जी, ध्रुव जी — ये सब पूरी तरह छोड़ के निकल गए, तब उन्हें मंत्र दिया गया। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में तय करना होता है कि इसको क्या देना है। जब व्यक्ति अपने परिवार-समाज के साथ जीते हुए अपना कल्याण करना चाहता है, तो उसे कर्म का सिद्धांत बताया जाता है; और जब वह सब छोड़ के संन्यासी मार्ग पर चला जाता है कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, तो उसे कोई भी नाम दे दिया — अब ये निकाल लेगा। देखिए, नारद जी ने पहले 'राम राम' बोला, नहीं निकला, 'मरा' निकला; बोले अच्छा, 'मरा' जप लो। तो मंत्र किसका हुआ? वाल्मीकि जी का। बस यह भाव की बात है — जो भाव उनके भीतर से निकला, उसी को पकड़ ले, और तेरा कल्याण तुरंत; बस भरपाई करना है पिछले कर्म का, क्योंकि तुझे कुछ नहीं चाहिए। आज गृहस्थों को मंत्र बांटा जा रहा है, इन्हें कर्म का सिद्धांत बताना था। अर्जुन 'मेरा' के मोह में भाग रहे थे, और वाल्मीकि जी समझ गए थे कि कुछ नहीं है, उनका मोह टूट गया था। तो गुरु साधक की स्थिति देखता है — कौन सा साधक है, कैसा आया है — और स्थिति-परिस्थिति देखते हुए मार्ग बताता है।
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वीडियो: दर्शन से हमें क्या सीखना है ? #livesatsang #yogi Ji ka satsang · 2025-03-13