प्रश्नोत्तर P23-0011 · भाग 23
गुरु जी, 'कुछ नहीं चाहिए' के भाव में — जैसे कोई मजदूर है, उसकी रोजी-रोटी, आय — उसमें भाव नहीं होना चाहिए? और परिवार में, घर-गृहस्थी में रहते हुए एकदम 'कुछ नहीं चाहिए' की स्थिति तो नहीं हो सकती।
नहीं, मेहनत करो उसके लिए; बिना मेहनत का भाव मत रखो। और पता चला कि आप जहां काम कर रहे हो, वहां दिन भर सो के पगार ले रहे हो, तो ये भी बेईमानी है। जरूरत में जियो — जरूरत में जीना 'कुछ नहीं चाहिए' में जीना है, आप इसे समझिए। जितनी जरूरत है उसमें जियो; जितनी आपकी मेहनत है उतना पगार लो, उतना पैसा लो। जैसे मेरी उंगली में चोट लग गई — नदी में स्नान कर रहा था, गिर गया, उंगली फट गई, खून ही खून, और हमारी जेब में एक भी रुपया नहीं। रास्ते में एक लड़के से परिचय हो गया था, वो साथ में गया; मैंने कहा अगर पैसा चाहिए तो इससे दिला दूंगा और बाद में मंगा के इसको दे दूंगा। डॉक्टर ने इलाज किया, फिर बोला — परिक्रमा वासी का मैं पैसा नहीं लेता। हमने कहा, डॉक्टर साहब, मैं परिक्रमा वासी नहीं हूं। बोले नहीं-नहीं, आपसे पैसे नहीं लेंगे। तब ठीक है — लेकिन यह पता चल जाए आपको कि मैं परिक्रमा वासी नहीं हूं; अब नहीं लो तो बात अलग है। चाहता तो मैं चला जाता, लेकिन मैं बेईमान हो जाता। पैसा उसने तब भी नहीं लिया, लेकिन मैं नहीं बोलता तो बेईमान होकर जाता, और मैंने बोल दिया तो ईमानदार होकर निकल लिया। बस इतनी सी बात है। अपनी मेहनत का पैसा लो, जरूरत में जियो, सत्कर्म, ईमानदारी — और 'कुछ नहीं चाहिए' मतलब योग्यता से ज्यादा नहीं चाहिए। समोसे खाना है तो खाऊंगा, लेकिन ईमानदारी के पैसे से — ये ध्यान रखना। इस दुनिया में जितनी भी वस्तुएं बनी हैं, उपयोग करने के लिए हैं — सदुपयोग, ईमानदारी के धन से; दुरुपयोग नहीं। जिससे आपका हित हो उन वस्तुओं का उपयोग करना, जिससे अहित हो वो नहीं। बुरी वस्तुओं का सेवन कभी मत करना; ऐसी वस्तुओं का उपयोग करना जिससे आप आत्मिक रूप से गिरो नहीं और शरीर को भी लाभ हो।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: दर्शन से हमें क्या सीखना है ? #livesatsang #yogi Ji ka satsang · 2025-03-13