प्रश्नोत्तर P23-0166 · भाग 23
गुरु जी, कहा जाता है कि नाम के समान कुछ नहीं है, नाम से पाप छूट जाते हैं। तो क्या नाम जप ही मूल है?
नाम आपके सहायक कब होंगे? जब ईमानदारी और सत्कर्म के बाद — तब सहायक होंगे। मैं आपको एक बता रहा हूं: जैसे टिकट — एक टिकट ले लो तो उस लाइन में लोकल से लेकर सुपर एक्सप्रेस तक किसी भी गाड़ी में चढ़ सकते हो; लेकिन टिकट ना लो तो चलेगा क्या? नहीं। बिल्कुल इसके बिना तो कुछ नहीं है। सर्वप्रथम पहले यह है — ईमानदारी, सत्कर्म; बाद में आप कुछ भी करो, सब सहायक है। जो भी हम लेते हैं, उसका कुछ उपयोग है, ऐसे ही नहीं लेते। आप इतिहास उठा के देख लीजिए — रामकृष्ण परमहंस से ले लीजिए और इसके पीछे चले जाइए — जितने भी महापुरुष हुए, उन्होंने सत्संग किया; किसी को मंत्रों में नहीं उलझाया, विधियों में नहीं उलझाया। अर्जुन को कृष्ण ने कोई मंत्र दिया? राजा जनक को अष्टावक्र ने ज्ञान का उपदेश दिया, सत्संग दिया — मंत्र थोड़ी दिया कि एक रटो। रुकने से ही तो ज्ञान होना है; रुक कहां रहे लोग? रसपान से रुक जाएं तो ज्ञान हो जाए।
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वीडियो: साधक की दिनचर्या क्या होनी चाहिए ? / दिनचर्या साधक की #livesatsang · 2025-03-12