प्रश्नोत्तर P24-0059 · भाग 24
गुरुदेव, ध्यान में सांसों पर ध्यान करते हैं, बोलते हैं इसी से मुक्ति मिलेगी — गौतम बुद्ध को भी इसी से मिली थी। क्या ये सही है?
सांस तो अपने आप आ-जा रहा है, उस पर ध्यान से क्या मतलब? कौन बताता है गौतम बुद्ध को इसी से मिली थी? किताबों में सब नहीं लिखा है। किताबें लिखने वाले आदमी ही हैं, किताबों की लिपि सब बदली जाती है। गौतम बुद्ध करते-करते थक गए तो आखिरी में हठ योग में बैठ गए। वो निराश हो गए, सब छोड़कर बैठ गए — 'और कुछ नहीं चाहिए' में आ गए। करके थक गए; इस स्थिति में पहुंच जाता है जीव। वो सांसों से नहीं पहुंचे थे। कोई किसी विधि से नहीं पहुंचा है, किसी का भी नाम ले लो। आखिर में विधियां छूट जाती हैं, थक जाता है व्यक्ति, सब छूट जाता है, वह बचता है शेष — उस समय उसकी उपलब्धि होती है। बोधि वृक्ष के पास बैठ गए कि अब उपलब्धि होगी तभी उठूंगा, नहीं तो मर जाऊंगा। अब उनके नाम से लोग विधियां बांट रहे हैं। वो जब तक थे, सत्संग किए, दया-करुणा-प्रेम सिखाए लोगों को। हिंदू में बोला गया ईमानदार हो; मुस्लिम कौन — जिसमें ईमान हो; क्रिश्चियन — जिसमें प्रेम हो, लव इज गॉड; बुद्ध — दया, करुणा, प्रेम; महावीर — अहिंसा परमो धर्म, यहां तक कि किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचाओ; कबीर — भाईचारा, समभाव, समदृष्टि; गुरु नानक — जरूरतमंद की सेवा करो, परोपकार में लग जाओ। तो मैंने सबको देखा, सबको निचोड़ा, और कहा — परोपकार धर्म है, यही धर्म की परिभाषा है। इसमें कोई विधियों की बात नहीं होती। मैं जाकर लोगों से मिल-मिलकर बात किया — चर्च, दरगाह, मंदिर, श्मशान, नदियों में — फिर मैंने पक्का कर लिया कि सब मिलाजुला के परोपकार है: जरूरतमंद की सेवा करो, ईमानदारी से जीवन जियो। यही मूल है, और यही मेन बात लोग नहीं बता रहे।
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वीडियो: इस प्रकृति में पूर्ण कौन और अपूर्ण कौन है ? #प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-06