आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P24-0092 · भाग 24

गुरुदेव, किसी भी तरह ये संसार छूट जाए — मुझे नहीं चाहिए संसार, पर मुझे खींचता है। पता नहीं हम ही नहीं छोड़ पा रहे या वो हमें नहीं छोड़ रहा? कैसे छूटूं, यह उपाय दे दीजिए।

नहीं, तू ही नहीं छोड़ पा रही है। कोई बंधन तो है नहीं — तू देखो, आना चाही तो आ गई ना। तो कोई बंधन नहीं है। देख, मैं जहां हूं, क्या वहां मेरी जिम्मेदारी, कर्तव्य बाकी है — हां या ना? बस इतना मुझे देखना है। अगर हां, तो ठीक है, उसको निभाते हुए आते रहो। और अगर पूरा हो गया, अब मेरी जिम्मेदारी नहीं रही, अब मैं सिर्फ मोह के वशीभूत होकर वहां हूं — तो मेरा कहना है छोड़ दें कि भैया हम जा रहे हैं, आपको कभी मिलना हो तो आ जाना, आप स्वतंत्र हो; हम अपने कल्याण के लिए निकल रहे हैं, क्योंकि अब मेरा यहां काम नहीं है। अगर काम नहीं है तो मैं क्यों रुकी हूं? तुझे यह देखना है कि जिस परिवार में मैं हूं, वहां मेरा काम बाकी है या नहीं। अगर काम है तब तो रुक, और अगर काम नहीं है तो फिर रहने का क्या मतलब — तब मोह के वशीभूत होकर रह रही है। आखिर मैं कहीं हूं तो क्यों हूं — यह देखना है। और फिर अपने आत्मिक कल्याण में लगना पड़ेगा। तेरा निकलने का शुद्ध भाव है, तो उसके लिए काम भी तो करना पड़ेगा; अगर हम काम नहीं करेंगे तो होगा नहीं, चाहे कितना भी शुद्ध भाव हो। आज अगर हमारा भाव ही होता कि यमुना तट पर कुटिया बनाएंगे और हम काम नहीं करते, तो आज ना हम यहां होते ना आप। तो भाव के बाद काम भी है, कर्म भी है, तभी तो परिणाम आएगा — सिर्फ भाव से परिणाम नहीं आता, काम से परिणाम आता है। तो मुझे यह देखना है कि मैं उसके लिए काम कर रहा हूं, हां या ना।

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वीडियो: 28 रात अपनों की कुटिया हरियाणा यमुना तट #योगी · 2026-10-22