प्रश्नोत्तर P24-0093 · भाग 24
गुरुदेव, मैंने ऐसा सुना है और ऐसा सोचती भी हूं कि जब समय आता है तो हर चीज अपने आप छूट जाती है। मैं तो इसी में हूं कि समय आएगा तो सब अपने आप छूट जाएगा — क्या यह गलत है?
ये सब किस पे लागू होता है? मनुष्य के अलावा जितने हैं, उन पर। जैसे फल का समय आया, फल गिर गया — उसमें कर्ता भाव थोड़ी ना है। समय आए तो डाल टूट जाएगी, पेड़ गिर जाएगा, फल गिर जाएगा, नहीं तो तूफान-आंधी गिरा देगी। मानव को भी बीमारी आती है तो शरीर गिर जाता है, लेकिन हम उसे बचाने का प्रयास तो करते हैं ना। पेड़ थोड़ी ना प्रयास कर रहा है, कहीं जा पा रहा है — फल सड़ रहा है तो वहीं सड़ के गिर जा रहा है, कीड़े खा जा रहे हैं। हम तो अनेक-अनेक उपाय करते हैं अपने आप को बचाने के। समय आएगा, छूट जाएगा — समय किसका आएगा? मृत्यु का। क्या छूट जाएगा? प्राण छूट जाएंगे — ये शरीर की अवधि है। बाकी उद्धार के लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी। जैसे आपने टिकट लिया, तो चाहे सीट पर बैठे रहो, चाहे खड़े रहो, चाहे घूमो — जब आपका स्टेशन आएगा तो उतरना पड़ेगा; लेकिन एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक आप क्या करते हो, वो आपके ऊपर है। तो वैसे ही मृत्यु के पहले आप क्या करते हो, आपके ऊपर है — आप अपने उद्धार के लिए काम करते हो कि नहीं करते हो। बिना प्रयास के मुक्ति संभव नहीं है। उद्धार के लिए हमको ही आगे बढ़ना है, कठोर मेहनत करनी पड़ेगी — ऐसे नहीं होने वाला। ऐसे तो कभी भी हम मोह से नहीं छूटेंगे; आसक्ति छूटेगी नहीं, बढ़ती जाएगी। अगर अपने आप होता, तो इतने संत-महापुरुष इतनी तपस्या क्यों करते, किस-किस स्थिति में उन्होंने प्रयास किया और मुक्ति-मोक्ष का मार्ग बताया? ऐसे होता तो बोल देते कि अपने आप हो जाएगा, इंतजार करो। नहीं — अथाह प्रयास, पूरी तरह सौ में एक सौ एक प्रतिशत प्रयास करना पड़ेगा अपने आत्मिक कल्याण के लिए, तभी संभव है।
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